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Lakshya Competition Academy
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Upendra Singh Rajpurohit
जस्सूसर गेट के बाहर,
करणी माता मंदिर के पास,
लक्ष्य कैम्पस,
बीकानेर
Mobile- 9571563399
Rajpurohitsinghup@gmail.com

हिन्दी का उद्भव संस्कृत-प्राकृत-पाली-अपभ्रंष भाषा से हुआ है। यह शौरसेनी$माग्धी$अर्द्धमाग्धी$ अपभ्रंष से विकसित हुई, अनेक बोलियों के संकुल के रूप में स्थापित हुई है।
हिन्दी का विकास:- इसके विकास को तीन भागों में विभाजित किया जाता है।
1.    आदिकाल 2. मध्यकाल 3. आधुनिककाल
1.    आदिकाल:- इस काल में प्रारंम्भिक व्याकरण ‘‘शब्दानुषासन‘‘ लिखा गया जो हेमचन्द्र ने लिखा था । इस काल में अपभ्रंष के 8 स्वरों (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ ) के अलावा दो नये स्वर और विकसित हुए वे थे – ऐ, औ ।
- च्, छ्, ज्, झ् स्पर्श व्यंजन की जगह – स्पर्ष-संघर्षी व्यंजन हो गए।
- हिन्दी में ड़, ढ़ ( जो अरबी व्यंजन है) का विकास हुआ ।
- न, र, ल, स (दंत्य ध्वनियाँ) – वर्त्स्य हो गई ।
- शब्द क्रम निष्चित हो गया।
- हिन्दी में नंपुसक लिंग समाप्त हुआ, – इसके शब्द स्त्रीलिंग और पुल्ंिलग में बट गये, तत्सम शब्द बढे।
- अरबी फारसी शब्दों में वृद्धि हुई।

2.    मध्यकाल:- इस काल में 5 नई ध्वनियाँ विकसित हुई ‘क़‘, ‘ख़‘, ‘ग़‘, ‘ज़‘, ‘फ़‘
- हिन्दी का अपना व्याकरण विकसित हुआ ।
- देषज शब्दों का प्रयोग होने लगा, विदेषी शब्द ( अग्रेंजी, फ्रैंच, स्पेनिष, डच, पुर्तगाली शब्द) हिन्दी भाषा में आए ।
- यह काल हिन्दी भाषा और साहित्य का स्वर्ण काल था ।
3.    आधुनिक काल:- इस काल में ‘क़‘, ‘ख़‘, ‘ग़‘, ‘ज़‘ आदि अपने मूल स्वरूप (‘क‘, ‘ख‘, ‘ग‘, ‘ज‘) में लौट आए ।
- अंग्रेजी शब्दों के उच्चारण में ऑ स्वर का प्रचलन हुआ जैसे – डॉक्टर, ऑफिस ।
- संयुक्त व्यंजन ड्र का प्रचलन हुआ जैसे:- ड्रम, ट्रेन आदि ।

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