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Lakshya Competition Academy
PVT. Limited

Upendra Singh Rajpurohit
जस्सूसर गेट के बाहर,
करणी माता मंदिर के पास,
लक्ष्य कैम्पस,
बीकानेर
Mobile- 9571563399
Rajpurohitsinghup@gmail.com

राज्य के अन्र्तराज्य व अन्तर्राष्ट्रीय सीमाएँ

अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पर स्थित जिलों की संख्या

घड़ी दिषा सें:-
गंगानगर, हनुमानगढ़, चुरू, झुन्झनु, सीकर, जयपुर, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, सवाईमाधोपुर, कोटा, झालावाड़, बारां, चित्तौडगढ़, भीलवाड़ा, प्रतापगढ़, , उदयपुर, सिरोही, जालौर

पड़ौसी राज्य एवं राजस्थान के जिले निम्न हैं:-

पड़ौसी राज्य राजस्थान के जिले
1. पंजाब गंगानगर, हनुमानगढ़
2. हरियाणा हनुमानगढ़, चुरू, झुन्झनु, सीकर, जयपुर, भरतपुर, अलवर
3. उत्तरप्रदेष भरतपुर, धौलपुर
4. मध्यप्रदेष धौलपुर-बांसवाड़ा (करौली, माधोपुर, कोटा, झालावाड़, बांरा, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, प्रतापगढ़, बांसवाड़ा)
5. गुजरात बांसवाड़ा, डुंगरपुर, उदयपुर, सिरोही, जालौर

अन्तराष्ट्रीय सीमा पर स्थित जिलें निम्न हैं:-
गंगानगर – 210 कि.मी.
बीकानेर  – 168 कि.मी.
जैसलमेर – 464 कि.मी.
बाड़मेर – 228 कि.मी.

इस सीमा को रेडक्लिफ अंतर्राष्ट्रीय सीमा कहते हैं।

अन्तर्राज्य व अंतर्राष्ट्रीय सीमा को छूने वाले जिले गंगानगर एवं बाड़मेर हैं।

निम्न जिलों की सीमा 2 या 2 से अधिक राज्य से लगती हैं:-
हनुमानगढ़ (पंजाब व हरियाणा)    भरतपुर (हरियाणा व उत्तरप्रदेष)
धौलपुर (उत्तरप्रदेष व मध्यप्रदेष)   बांसवाड़ा (मध्यप्रदेष व गुजरात)

पाली को छूने वाले 8 जिले निम्न हैं:-
नागौर    अजमेर  राजसमन्द   उदयपुर
सिरोही   जालौर    बाड़मेर         जोधपुर

राजस्थान की सीमा पर स्थित पड़ौसी राज्यों के नगर निम्न हैं:-
पंजाब –   अबोहर

हरियाणा –   ऐलनाबाद , आदमपुर , हिसार , लौहारू , नारनोल , रेवाड़ी , फिरोजपुर , भिवानी (भिवानी)

उत्तरप्रदेष –   मथुरा , आगरा , फतेहपुर सीकरी (सीकरी) , खेरागढ़

मध्यप्रदेष -  मुरैना (सीमा धौलपुर से लगती हैं)
श्योपुर
शिवपुरी
गुना (सीमा बांरा से लगती हैं)
राजगढ़ (सीमा झालावाड़ा से लगती हैं)
मानपुरा
नीमच (सीमा चित्तौड़गढ़ से लगती हैं)
मंदसौर (झालावाड़, प्रतापगढ़ व चित्तौड़गढ़ से सीमा लगती हैं)
रतलाम

गुजरात -  पंचमहल , पालनपुर , बनास कांठा , हिम्मत नगर

भटिण्डा (पंजाब) व भिण्ड (मध्यप्रदेष) की सीमा राजस्थान से नहीं लगती हैं।

राजस्थान को छूने वाले पाकिस्तान के जिलें:-
बहावलपुर (सबसे बड़ा)
मीरपुर, उमरकोट/अमरकोट (सबसे छोटी सीमा)
खैरपुर (सबसे छोटी सीमा)

राजस्थान के संलग्न जिलें:-
डुंगरपुर-बांसवाड़ा
बीकानेर-जैसलमेर-बाड़मेर (सीमावर्ती पूर्णरूपेण मरूस्थलीय जिले)
अलवर-भरतपुर
कोटा-बांरा-झालावाड़ (हाड़ौती)
झालावाड़
नोट:- बूंदी – कोटा – (अलग हुए)
बांरा

प्रतापगढ़-उदयपुर-बांसवाड़ा।

जयपुर व झुन्झनु की सीमा आपस में नहीं लगती हैं।

पाली की सीमा भीलवाड़ा से नहीं लगती हैं।

टोंक व दौसा की सीमा आपस में लगती हैं।

भीलवाड़ा की सीमा कोटा से नहीं लगती।

नागौर की सीमा झुन्झनु से नहीं लगती।

जोधपुर व जालौर की सीमा नहीं लगती।

करौली की सीमा-भरतपुर, धौलपुर, दौसा, संवाईमाधोपुर से लगती हैं।

टोंक:- जयपुर, अजमेर, भीलवाड़ा, बूंदी, सवांईमाधोपुर, दौसा व कोटा से सीमा
लगती हैं।
जयपुर की सीमा हरियाणा से लगती हैं।

भीलवाड़ा की सीमा मध्यप्रदेष से लगती हैं।

राजस्थान का भौगोलिक वर्गीकरण

1. मरूस्थल 2. मैदान 3. पर्वत 4. पठार

राजस्थान का प्राचीनतम भू-भाग या भौतिक प्रदेष दक्षिण का पठारी भाग हैं जो भारत के गांेडवाना लैंण्ड का भाग हैं।

गोंड़वाना लैण्ड विष्व का सबसे प्राचीनतम पठार हैं।

मरूस्थल व भारत का महान मैदान टर्षरी (तृतीय) काल में टेथिस सागर का हिस्सा था, जो पर्यावरण, जलवायु में परिवर्तन के परिणामस्वरूप मरूस्थल मे बदल गया।

यदि हिमालय नहीं होता तो महान मैदान भी नहीं होता।

पश्चिम/थार का मरूस्थल:-
जो अरावली के पष्चिम में फैला हुआ हैं। राजस्थान का सबसे बड़ा भौगोलिक प्रदेष जो 1,75,000 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ हैं। जो राजस्थान के कुल भू-भाग का 60% , 61% हैं।

जिसमें राजस्थान की 40% जनसंख्या निवास करती हैं।

मरूस्थल राजस्थान का सर्वाधिक जनसंख्या वाला भौतिक प्रदेष हैं। (राजस्थान के सबसे बड़ा भू-भाग)

सन् 1981 से 2001 तक सर्वाधिक जनसंख्या वृद्धि दर वाले जिले क्रमष:-
बीकानेर (1981-91)  जैसलमेर (1997-2001)

राजस्थान सरकार के अनुसार मरूस्थल में 12 जिले हैं।

योजना आयोग व भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार मरूस्थल में 11 जिलें हैं। इसमें हनुमानगढ़ शामिल नहीं हैं।

12 जिलें:-  गंगानगर , बीकानेर , जैसलमेर , बाड़मेर , जालौर , चुरू , झुन्झनु , सीकर (षेखावटी) , जोधपुर , पाली , नागौर , हनुमानगढ़।

थार में बालूका स्तूपों का विस्तार 58% तक हैं।

मरूस्थल की विषेषताएँ:-

मरूस्थल का उत्तर में विस्तार पंजाब, हरियाणा से लेकर दक्षिण में कच्छ तक हैंे।

पूर्व में अरावली पर्वत, पष्चिम में पाकिस्तान तक फैला हुआ हैं।

बरखान:- भौतिक आकृति हैं, जो मरूस्थल में चलने वाली हवाओं के कारण
निर्मित अर्द्धचंद्राकार स्तूप होता हैं जो स्थानांतरित होते हैं।

ऐसे टीले जोधपुर, सीमावर्ती बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर में सर्वाधिक हैं।

इसको मार्च आॅफ रेगिस्तान भी कहते हैं।

इनका मार्च पूर्व की ओर (अरावली की ओर) हैं।

प्लाया:- ये रेतीले मरूस्थल में हवाओं से निर्मित प्राकृतिक झील होती हैं,जो प्लाया कहलती हैं। (नाड़ी) जैसलमेर।

खड़ीन:- रेगिस्तान में मानव निर्मित झील होती हैं, वर्षां के दिनों में इनमें पानी इकट्ठा होता हैं व किसान इसके चारों और खेती करते हैं, ऐसी कृषि को खड़ीन कृषि कहते हैं।

सेम:- जलप्लावित क्षेत्र होता हैं, ऐसे क्षेत्र का निर्माण अतयधिक सिंचाई के कारण तथा नहर के आसपास होता हैं। सेम क्षेत्र कृषि के लिए अनु-उपयोगी होता हैं। (बाड़मेर-कवास, मलवा)

इसके परिणामस्वरूप पर्यावरण असंतुलन, मिट्टी का अपरदन की समस्या उत्पन्न हो गई हैंे।

जोहड़:- शेखवटी क्षेत्र में चूना बाहुल्य वाले भागों में कम गहरे तलाबांे का निर्माण होता हैं, जिन्हे स्थानीय भाषा में जोहड़ या जोड़ा कहते हैं।

वेरा:- मारवाड़ क्षेत्र में (जालौर, जोधुपर, पाली) कुएँ को वेरा कहते हैं।

बावड़ी:- ये मानव निर्मित होती हैं जिसमें पानी निकालने के लिए सीढ़ियाँ होती हैं।

बीड़:- शेखावटी, अजमेर, बीकानेर में घास के मैदानों को बीड़ कहते हैं। उदाहरण:- जोड़बीड़, जोहड़बीड़

गोडवाड़:- लूनी नदी व अरावली के मध्य स्थित भू-भाग गोडवाड़ कहलाता हैं।

बांगड़ क्षेत्र:- अरावली के पष्चिम में शेखावटी प्रदेष से लेकर लूनी नदी के बेसिन तक फैला भौतिक प्रदेष। यह नदी और रेत से निर्मित भू-भाग हैं जो कभी कृषि के लिए उपयोगी था।

डोयला/डोई:- लकड़ी के चम्मच को डोलया कहते हैं। शेखावटी क्षेत्र में चाटु कहते हैं। कैर की लकड़ी से बनता हैं।

मरूस्थलीय वनस्पति:-
- मरूस्थलीय वनस्पति को जेरोफाइट कहते हैं।
- ऐसी वनस्पति कठोर छाल वाली होती हैं। जिसकी जड़ें गहरी, पत्तियाँ कांटों के रूप में पाई जाती हैं।
- मरूस्थलीय वनस्पति कठोर होती हैं, क्योंकि मरूस्थलीय जलवायु उष्ण कटिबंधीय हैं।
- ग्लोब पर कर्क व मकर रेखा के बीच का क्षेत्रफल उष्णकटिबंण्धीय होता हैं, जहां सूर्य की किरणें वर्षं के अधिकांष समय तक सीधी पड़ती हैं।
(23)0 कर्क – 23)0 मकर)

खेजड़ी:- उपनाम:-जांटी, शमी, थार का कल्पवृक्ष, थार की तुलसी।
- खेजड़ी की पूजा कृष्ण जनमाष्टमी व दषहरे पर होती हैं।
- दशहरे पर इसकी पूजा राजपूतों द्वारा की जाती हैं।
- इस अवसर पर अस्त्र-ष़स्त्रों की पूजा भी होती हैं।
- खेजड़ी का मेला जोधपुर के पास खेजड़ली गांव में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की नवमी को भरता हैं।
- कृष्ण पक्ष:- शुक्ल (सुदी) पक्ष
- सन् 1730 में खेजड़ी को बचाते हुए 363 स्त्री, पुरूष, बच्चे शहीद हो गए।
- चिपको आंदोलन की विचारधारा यहीं से उत्पन्न हुई।
- वर्तमान में चिपको आंदोलन के प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा (उत्तरांचल के) हैं।
- सांगरी:- खेजड़ी का फल हैं। ;।चतपस दृ डंलद्ध
- मार्च में बगर यानि फूल लगते हैं, अप्रैल में सांगरी बनती हैं। (लूम)

रोहिड़ा:-
- राजस्थान का राज्य पुष्प हैं।
- रोहिड़े को राजस्थान का सागवान भी कहते हैं।
- राजस्थान के दक्षिण-पष्चिमी भाग (बाड़मेर, जोधपुर, जालौर) में रोहिड़ा सर्वाधिक पाया जाता हैं।
- रोहिडे़ का पुष्प केसरिया हिरमिच (गाढ़ा लाल) होता हैं।
- गर्मी के बढ़ने के साथ रोहिड़ा फलता-फूलता हैं।
- अप्रैल-मई में यह पूर्ण रूप से खिल जाता हैं।

कैर:-
- मरूस्थलीय झाड़ी, जिसके फल का उपयोग सब्जी, आचार बनाने में किया जाता हैं।
- कैर पकने पर ढ़ालू बनता हैं। (लाल रंग का)

कुमटा:-
- जोधपुर, बाड़मेर में कुमटा के पेड़ सर्वांधिक पाए जाते हैं।
- इसके बीज को कुमटिया कहते हैं। जो सब्जी व आचार बनाने में काम आते हैं।
- कुमटा के कांटे टेढ़े होते हैं।

जाल:-
- मरूस्थलीय पेड़ जो पाली, जोधपुर, जालौर क्षेत्र में सर्वांधिक पाए जाते हैंे।
- इसका फल ग्रामीण क्षेत्र में पाया जाता हैं, जिसे पीलू कहते हैं।
- कैक्ट्स, थोर, नागफनी:- ये कांटेदार होते हैं।

गूंदी/गूंदे:-
- पाली, जालौर, जोधपुर, सिरोह में सर्वाधिक पाए जाते हैं। इसका उपयोग आचार बनाने में किया जाता हैं।
- खेजड़ी सर्वाधिक नागौर में पाई जाती हैं।
- कीकर सर्वाधिक शेखावटी क्षेत्र में पाया जाता हैंे।

मरूस्थलीय जलवायु:- मरूस्थल में दो प्रकार की जलवायु पाई जाती हैं:-
उष्ण कटिबंधीय शुष्क जलवायु प्रदेष:-
इसके अंतर्गत सीमान्त जिले आते हैं। जैसे:- गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, पष्चिमी जोधपुर आदि।

शुष्क जलवायु:- जहां वर्षां की मात्रा औसत 10-15 सेमी. हैं। जहां गर्मी में धूल भरी आंधिया चलती हैं।

उष्ण कटिबंधीय अर्द्धशुष्क जलवायु वाला प्रदेष:-
इसके अंतर्गत अरावली के एकदम पष्चिम में स्थित जिले जैसे:- झुन्झनु, सीकर, चुरू, पाली, नागौर, जलौर, पूर्वी जोधपुर, कुछ हिस्सा सिरोही का अर्द्धषुष्क में आते हैं। जहां वर्षां की मात्रा 40 सेमी. के आसपास होती हैं।

मध्यवर्ती पर्वतीय प्रदेष (अरावली):-
- अरावली राजस्थान के मध्य मे स्थित हैं, जिसका विस्तार उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पष्चिम में 692 कि.मी. तक स्थित हैं।
- उत्तर-पूर्व में इसका विस्तार दिल्ली में रायसीना की पहाड़ियों तक हैं।
- दक्षिण-पष्चिम में गुजरात के पालनपुर जिलें में खेड़ब्रह्यम तक हैं।
- राजस्थान की भौगोलिक सीमाओं के भीतर इसकी कुल लम्बाई 550 कि.मी. हैं।

अरावली का जिलेवार विस्तार:-
त्तर-पूर्व से दक्षिण-पष्चिम की ओर क्रमषः-
- अलवर, झुन्झनु (खेतड़ी), जयपुर, सीकर (नीम का थाना), अजमेर, पाली, भीलवाड़ा, राजसमंद, उदयपुर, सिरोही, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, डुंगरपुर, बांसवाड़ा (14)
- अरावली को मेरू भी कहते हैं।
- अरावली विष्व का प्राचीनतम पर्वत व भौतिक प्रदेष हैं, जिसकी चट्टाने वलयदार हैं।
- खनिजों की मात्रा और संख्या की दृष्टि से धनी हैं। कुछ खनिज ऐसे हैं, जो सर्वाधिक अरावली में पाये जाते हैं। जैसें:-सीसा-जस्ता, चांदी आदि।
- अरावली के दक्षिण में सर्वांधिक खनिज पाए जाते हैं, जैसे-जैसे अरावली के उत्तर-पूर्व में जाते हैं। खनिजों की संख्या व मात्रा में कमी आती हैं।
- अरावली का दक्षिण-पष्चिम भाग सर्वांधिक चैड़ा हैं।
- अजमेर में इसकी चैड़ाई सबसे कम हैं।
- उदयपुर से अजेर तक श्रंृखलाबद्ध हैं, अजमेर के बाद अरावली कटी-छटी हैं।
- अरावली राजस्थान के लिए जल-विभाजन का काम करती है। (वर्षां जल का)
- अरावली भारत के महान जल विभाजक का अंग हैं।
- अरावली के पष्चिम में लूनी नदी बहती हैं व पूर्व में बनास नदी बहती हैं।
- अजमेर अरावली के न् घाटी (यू) में स्थित हैं। (अजमेर अरावली के मध्य में स्थित जिला)।
- प्लेटनुमा भू-भाग में स्थित नगर उदयपुर हैं।
- दक्षिण-पष्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर अरावली की ऊँचाई में कमी आती हैं।

गुरू षिखर:-
- माऊन्ट आबू में स्थित मध्य भारत की सबसे ऊँची चोटी, जिसकी ऊँचाई 1727 मी. हैं।
- कर्नल जेम्स टाड ने गुरू षिखर को संतो का षिखर कहा।
- कर्नल टाड ने अपने एजेन्ट के कार्यकाल में राजस्थान से प्राप्त अनुभवों को लंदन जाकर ‘एनल्स एण्ड एन्टीक्यूटीज आॅफ राजस्थान’ में संकलित किया
हैं।दूसरा भाग ‘ट्रेवल्स इन वेस्टर्न इण्डिया’ हैं।
- 1822 तक टाड राजस्थान के सबसे लोकप्रिय पाॅलिटिकल ऐजेन्ट थे। ये पष्चिमी राजपूताना प्रान्त के पाॅलिटिकल एजेन्ट रहे थे।

सेर:-
- सिरोही में स्थित, इसकी ऊँचाई 1597 मीटर हैं।
- यह दूसरी सबसे ऊँची चोटी हैं।

जरंगा:- उदयपुर में स्थित तीसरी चोटी, इसकी लम्बाई 1442 मीटर हैं।

उत्तर-पूर्वी व पूर्वी मैदानी भाग:-
- ये मैदान राजस्थान के उत्तर-पूर्व में अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, सवांईमाधोपुर, दौसा, जयपुर, चम्बल बेसिन और बनास बेसिन में स्थित हैं।
- यह मैदान भारत के महान मैदान का विस्तार हैं।
- महान मैदान उत्तर भारत में गंगा-यमुना का मैदान कहलाता हैं।
- प्रत्यक्ष रूप से गंगा-जमुना के मैदान में अलवर, भरतपुर स्थित हैं।
- एकल रूप में अलवर स्थित हैं।
- समूह रूप में अलवर, भरतपर व धौलपुर स्थित हैं।

विषेषताएँ:-
- ये मैदान राजस्थान का सर्वाधिक उपजाऊ भाग हैं जो कृषि, उद्योग, खेती, व्यापार-वाणिज्य, यातायात की दृष्टि से विकसित हैं।
- इस मैदान का निर्माण जलोढ़ मिट्टी से हुआ हैं। इस मिट्टी को कांप, दोमट व कच्छारी मिट्टी भी कहते हैं।
- जलोढ़ मिट्टी विष्व की सर्वाधिक उपजाऊ मिट्टी हैं।
- इस मिट्टी में सभी प्रकार की फसलें होती हैं।
- इस प्रदेष का जनसंख्या घनत्व सर्वाधिक हैं, जो लगभग 300 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर हैं।
- इस मैदान मे 39% जनसंख्या निवास करती हैं।
- मरूस्थल का जनसंख्या घनत्व 50 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से कम हैं।
- इस मैदान में बहने वाली नदियाँ बनास और चम्बल हैं।
- मैदान की पूर्वी सीमा विंध्यन कगार से बनती हैं व पष्चिमी सीमा अरावली से बनती हैं।
- अरावली क्षेत्र मंे 11% जनसंख्या निवास करती हैं, जबकि 9% पठारी भाग स्थित हैंे।

दक्षिण का पठारी भाग:-
- राजस्थान में दक्षिण और दक्षिणी-पूर्वी भाग भारत के गोड़वाना लेण्ड का हिस्सा हैं, जो विष्व का प्राचीनतम पठारी क्षेत्र हैं।
- इस प्रकार राजस्थान का पठारी भाग राजस्थान का प्राचीनतम भौतिक प्रदेष हैं।
- मध्यप्रदेष के मालवा का पष्चिमी विस्तार हैं।
- ये पूर्ण परिपक्व पठार हैंे।

हाड़ौती का पठार:-
- राजस्थान के दक्षिण-पूर्व में कोटा, बूंदी, झालावाड़, बांरा को हाड़ौती क्षेत्र कहते हैं, क्योंकि यहां पर हाड़ा वंषी चैहानों का शासन था।

- यह मालवा का पष्चिमी विस्तार हैं।
- काली मिट्टी से निर्मित हैं, मालवा का पठार (मध्यप्रदेष) भी काली मिट्टी से निर्मित हैं।
- इस प्रदेष को सोया प्रदेष कहते हैं।
- काली मिट्टी जलोढ़ के बाद सर्वांधिक उपजाऊ मिट्टी हैं।
- हाड़ौती के पष्चिम में चम्बल नदी बहती हैं।
- इस प्रदेष में पार्वती, कालीसिन्ध, आहु, परवान, निवाज नदियाँ कहती हैं, जो प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से चम्बल नदी में दांयी ओर से मिलती हैं।
- इस प्रदेष में हरियाली अधिक होने पर भी गर्मी अधिक पड़ती हैं, क्योंकि काली मिट्टी की अधिकत हैं।
- गागरोन का किला हाड़ौति का सर्वाधिक प्रसिद्ध किला हैं, जो एक जलदुर्ग हैं, जो कालीसिंध व आहु के संगम पर स्थित हैं।
- हाड़ौती का सबसे प्राचीन जिला बूंदी हैं।
- हाड़ा वंष की प्राचीनतम राजधानी बूंदी हैं।
- गागरोन के किले में पृथ्वीराज राठौड़ ने वेलि क्रिसन रूकमणसीरी नामक पुस्तक लिखी, जिसे दुरसा आढ़ा ने पांचवा वेद कहा।

मुकन्दवाड़ा का पठार:-
- कोटा, बूंदी, झालावाड़ के मध्य स्थित पठारी भाग, जहां दुर्रा नामक अभ्यारण्य (कोटा) में स्थापित किया जा रहा हैं।
- जिसे तीसरा राष्ट्रीय अभयारण्य का दर्जा देने की प्रक्रिया चल रहीं हैं।

ऊपरमाल की पहाड़ियाँ:-
- राजस्थान के दक्षिण-पूर्व के मध्य भाग में स्थित पठारी भाग जिसका सर्वांधिक विस्तार भीलवाड़ा में हैं।
- ऊपरमाल का क्षेत्र बिजौलिया (भीलवाड़ा) किसान आंदोलन, बेंगू (चित्तौड़गढ़) आंदोलन के लिए प्रसिद्ध था।

भोराट का पठार:- उदयपुर के गोगुन्दा और राजसमन्द के कुम्भलगढ़ के मध्य में स्थित पठार हैं।

मगरा/भाकर/डूंगर:- पहाड़ी क्षेत्र जो पाली की पूर्वी सीमा, राजसमन्द, उदयपुर, सिरोही, अजमेर के दक्षिण में स्थित हैं।

बांगड़ क्षेत्र:- डंूगरपुर, बांसवाड़ा को बांगड़ क्षेत्र कहते हैं। (वाग्वर) (व्याघ्रवाट)

मेवल:- डंूगरपुर व बांसवाड़ा के बीच का क्षेत्र मेवल कहलाता हैं।

भाकर:-

- तीव्र ढ़ाल वाली ऊबड़-खाबड़ कम ऊँची पहाड़ियों को सिरोही, जालौर, पाली में भाकर कहते हैं।
- पाली में मानपुरा कस्बा मानपुरी भाकरी कहलाता हैं।

छप्पन का मैदान:-
चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, डंूगरपुर, बांसवाड़ा व उदयपुर का मध्यवर्ती भाग/मैदानी भाग छप्पन का मैदान कहलाता हैं। यह आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र हैं।

गिर्वा/गिरवा:-
गिर्वा जहां उदयपुर स्थित हैं, उसके चारों ओर स्थित पहाडियाँ व समतल मैदान से निर्मित भौतिक आकृति गिरवा कहलाती हैं।

खेरवाड़/खेराड़:- भीलवाड़ा में स्थित हैं। यह बनास नदी का बेसिन हैं।

मेरवाड़ा की पहाडियाँ:-
- यहा मेर नामक जाति के लोग रहते थे। इसका विस्तार अजमेर के दक्षिण में, पाली, राजसमंद, भीलवाड़ा के मध्य में हैं।

- ब्रिटिष सरकार ने क्रांति के समय मेर बटालियन का गठन किया था, जिसने नसीराबाद छावनी की सुरक्षा की।

मेवात:- अलवर व भरतपुर को मेवात कहते हैं।

डूंगरपुर-बांसवाड़ा से कर्क रेखा गुरजती हैं, जो डूंगरपुर के दक्षिण किनारे को छूते हुए बांसवाड़ा के लगभग मध्य से होकर गुजरती हैं।

अरबूद:- इसमें दक्षिणी-पूर्वी सिरोही व आबू पर्वत खण्ड मुख्यतः सम्मिलित हैं।

राजस्थान की नदियाँ:- प्राकृतिक रूप से बहती हुई जलधारा जो सागर में गिरे नदी कहलाती हैं। राजस्थान के नदी तंत्र को प्राकृतिक रूप से 3 भागों में विभाजित किया जाता हैं:-
1. बंगाल की खाड़ी का नदी तंत्र   2. अरब सागर का नदी तंत्र   3. आंतरिक अपवाह तंत्र

बंगाल की खाड़ी का नदी तंत्र:-
चम्बल, बनास, बेड़च, कोठारी, खारी, मानसी, मोरेल, पार्वती, कालीसिन्ध, परवान, आहु, निवाज, बामनी, कुराल, गंभीरी, गंभीर, बाणगंगा।

चम्बल नदी:-
- उद्गम स्थल:- विन्ध्याचल पर्वत के उत्तरी ढ़ाल में।
- (मध्यप्रदेष) मरू/महु के पास जानापावों की पहाड़ी से निकलती हैं।
- जो मध्यप्रदेष के उत्तर-पष्चिम की ओर बहती हैं। फिर उत्तर-पूर्व की ओर बहते हुए राजस्थान में चित्तौड़गढ़ के चैरासीगढ़ नामक स्थान में प्रवेष करती हैं।
- चित्तौड़गढ़ के उत्तर में भैंसरोड़गढ़ नामक स्थान पर बामनी नदी बांई ओर से चम्बल नदी में गिरती हैं।
- इस स्थान पर चूलिया जलप्रपात स्थित हैं, जिसकी ऊँचाई लगभग18 मीटर हैं।

चम्बल का बहाव:-
- चित्तौड़गढ़, कोटा, बूंदी, माधोपुर, करौली, धौलपुर में बहते हुए उत्तरप्रदेष में ईटावा के पास (मुरादगंज) के पास यमुना में मिलती हैं।
- चम्बल नदी यमुना की सबसे लम्बी सहायक नदी हैं।
- कोटा, बूंदी व करौली मे यह नदी घाटी/भंरष/दरार में बहती हैं।
- राजस्थान व मध्यप्रदेष के बीच 250 किलोमीटर (241 किलोमीटर) लम्बी सीमा बनती हैं।
- राजस्थान में चम्बल की कुल लम्बाई 135 किलोमीटर हैं। (चित्तौड़गढ़ से संवाईमाधोपुर तक)
- चम्बल की कुल लम्बाई 966 किलोमीटर हैं।
- चम्बल का उपनाम:- कामधेनू, चर्मण्वती, सदानीरा, नित्यवाही हैं।

- चम्बल नदी पर स्थित बांध (उत्तर से दक्षिण क्रम में):-

कोटा-बैराज बांध:-
कोटा में स्थित, यह अवरोधक बांध हैं।
कोटा बैराज बांध से सिंचाई के लिए नहरे निकली गई हैं।

जवाहर सागर बांध:-
कोटा में स्थित, इससे जल-विद्युत उत्पादित होता हैं। इससे सिंचाई
नहीं होती हैं।

राणाप्रताप सागर बांध:- चित्तौड़गढ़ में स्थित भैंसरोड़गढ़ के पास (चैरासीगढ़ के उत्तर में) जल विद्युत उत्पन्न होता हैं।

गांधी सागर बांध:- मध्यप्रदेष के मंदसौर जिले में स्थित हैं।

उपर्युक्त सभी बांधों को चम्बल नदी घाटी परियोजना कहते हैं, जो राजस्थान की पहली परियोजना थी।

यह परियोजना राजस्थान व मध्यप्रदेष की संयुक्त परियोजना हैं। जिसमें 50-50 % की भागीदारी हैं।

चम्बल व माही नदी दक्षिण से प्रवेष करती हैं।

दूसरी पंचवर्षीय योजना में उत्पादन शुरू व पहली में स्थापना।

चम्बल नदी पर कुल 8 लिफ्ट नहर हैं, जिसमें से 6 लिफ्ट नहर बांरा के लिए (बांरा – वराहनगरी), 2 कोटा के लिए।

इंदिरा लिफ्ट नहर:- सवांईमाधोपुर में स्थित, इससे करौली जिले को पेयजल व सिंचाई के लिए पानी मिलता हैं।

कुल विद्युत उत्पादन:-

  • जवाहर सागर बांध:- 99 मेगावाट
  • राणाप्रताप सागर बांध:- 115 मेगावाट
  • गांधी सागर बांध:- 172 मेगावाट
  • कुल उत्पादन:- 386 मेगावाट
  • इसमें राजस्थान को 386 » 2 = 193 मेगावाट प्राप्त होता हैं।

चम्बल नदी के आस-पास बीहड़ क्षेत्र के विकास के लिए डांग क्षेत्रीय विकास कार्यक्रम, कन्दरा क्षेत्रीय विकास कार्यक्रम चल रहे हैं।

चम्बल नदी पर भारत का एकमात्र घड़ियाल अभयारण्य स्थित हैं, इस अभयारण्य के अंतर्गत भैंसरोड़गढ़ अभयारण्य, जवाहर सागर अभयारण्य, चम्बल अभ्यारण्य शामिल हैं। ये तीनों को घड़ियाल अभयारण्य हैं।

मुरैना में घड़ियाल प्रजनन केन्द्र स्थित हैं, जहां से घड़ियाल चम्बल नदी में छोड़े जाते हैं।

चम्बल नदी में डाॅल्फिन मछली पाई जाती हैं। जिसे गांगेय सूस कहते हैं।

दांयी ओर से चम्बल में मिलने वाली नदियां:-
कालीसिंध, पार्वती (प्रत्यक्ष रूप से), आहु परवान, निवाज (तीनों अप्रत्यक्ष रूप से)।

कालीसिंध और आहु का संगम झालावाड़ में होता हैं, जहां गागरोन का किला स्थित हैं, जो जलदुर्ग हैं।

भैसरोड़गढ़ विषुद्ध रूप से जलदुर्ग हैं, जो बामनी व चम्बल नदी के संगम पर स्थित हैं।
कालीसिन्ध, पार्वती व निवाज का उद्गम स्थल मध्यप्रदेष हैं।

परवान का उद्गम झालावाड़ से होता हैं।

नदी जोड़ो परियोजना के अंतर्गत सर्वप्रथम कालीसिन्ध व बेतवा को जोड़ा जाएगा।

चम्बल नदी में बांई ओर से मिलने वाली नदियां:-

  • बनास, बेड़च, कोठारी, खारी, मानसी, मोरेल, कुराल बामनी आदि हैं।

बनास नदी:- इसका उपनाम वर्णाषा, वन की आषा, वषिष्ठी हैं।

  • यह राजसमन्द में खमनौर की पहाड़ियों से (कुम्भलगढ़ के पास) से निकलती हैं।
  • राजसमन्द, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, अजमेर, टोंक, सवांईाधोपुर में
  • बहते हुए खण्डार के पास चम्बल में मिलती हैं। ;त्न्ब्ठ।ज्ैद्ध
  • खण्डार अभयारण्ड सवांईमाधोपुर में स्थित हैं।
  • बनास नदी पर स्थित बीसलपुर बांध टोड़ा रायसिंह के पास टोंक में स्थित हैं, इस बांध से जयपुर व अजमेर को पानी मिलेगा।

ईसरदा बांध:-

  • सवांईमाधोपुर व टोंक की सीमा पर स्थित हैं, इससे सवांईमाधोपुर व टोंक की सीमावर्ती गांवों को पानी मिलेगा।
  • बनास नदी सम्पूर्ण रूप से राजस्थान में बहने वाली सबसे लम्बी नदी है। इसकी कुल लम्बाई 480 किलोमीटर हैं।
  • राजस्थान की सबसे लम्बी नदी चम्बल नदी हैं।
  • राजस्थान में सबसे लम्बी नदी बनास नदी हैं।
  • बनास का अपवाह क्षेत्र 10.40 % हैं, चम्बल का 20.80% हैं।
  • बनास की सहायक नदियां:- बेड़च, कोठारी, खारी, मानसी, मोरेल, गंभीरी, मैनाल, बाण्ड़ी हैं।

 

कोठारी नदी:-

  • राजसमन्द में दिवेर की पहाड़ियो से बिजराला नामक स्थान से निकलती हैं।
  • राजसमन्द-भीलवाड़ा में बहती हैं, भीलवाड़ा में बनास में गिरती हैं।
  • भीलवाड़ा में इस नदी पर मेजा बांध स्थित हैं। जिससे भीलवाड़ा नगर को पीने का पानी उपलब्ध होता हैं।
  • यह कंकड़, पत्थर का बना बांध हैं।
  • कोठारी बनास की सहायक नदीं हैं।

 

बेड़च नदी:-

  • उदयपुर व गोगुन्दा की पहाड़ियों से निकलती हैं। इसका प्राचीन नाम आयड़ था।
  • उदयपुर, राजसमन्द, भीलवाड़ा में बहती हैं व भीलवाड़ा में बनास में मिलती हैं।
  • उद्गम से उद्यसागर झील में गिरने तक यह आयड़ कहलाती हैं व इसी नदी के किनारे आहड़ सभ्यता स्थित हैं। जो ताम्रपाषाणकालीन सभ्यता हैं।
  • इसकी नदी के किनारे उदयपुर में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति शोध संस्थान स्थित हैं। (उदयसागर:- बनास तक बेड़च)।

गंभीरी:-

  • यह बड़ी सादड़ी चित्तौड़गढ़ से निकलती हैं और भीलवाड़ा में बनास में गिरती हैं।
  • इस नदी पर एक बांध स्थापित किया गया हैं।
  • जिससे आदिवासियों को पीने का पानी और सिंचाई हेतु जल उपलब्ध होता हैं।
  • इसका सहायक नदी बेड़च हैं।
  • गम्भीरी नदी भीलवाड़ा में बेड़च में गिरती हैं, जहां बेड़च त्रिवेणी संगम बनाती हैं। (मेनाल, गम्भीरी, बेड़च)

बाणगंगा:-

  • यह जयुपर में बैराठ की पहाड़ियों से निकलती हैं।
  • जयपुर, दौसा, भरतपुर में बहते हुए उत्तरप्रदेष में यमुना में गिरती हैं।
  • राजस्थान की एकमात्र नदी जो राजस्थान से निकलकर अकेले बहते हुए यमुना में गिरती हैं।
  • इस नदी के आसपास जयपुर में मौर्यकालीन संस्कृति व बौद्ध कालीन संस्कृति के अवषेष मिले हैं।
  • अषोक ने बैराठ (विराट नगर) में भ्राबू षिलालेख लिखवाया, जिस पर त्रिरत्न का उल्लेख है। (बौद्ध, धम्म, संघ)।
  • मत्स्य जनपद की राजधानी विराटनगर हैं।
  • उत्तर-पूर्वी राजस्थान में बहने वाली सबसे लम्बी नदी बाणगंगा हैं।
  • जनपद काल मंे इस नदी के आसपास का क्षेत्र मत्सय जनपद कहलाता था, जिसकी राजधानी विराटनगर थी।

विषेषताएँ:-

  • बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ अधिकांष प्रायद्वीपीय पठार से निकलती हैं। (एक नदी अरावली से नहीं निकलती, जोजरी/भीतरी)
  • मध्यप्रदेष से निकलकर राजस्थान में दक्षिण में प्रवेष कर बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदी चम्बल हैं।
  • पूर्वी राजस्थान में बहने वाली नदियों में अधिषेष पानी की मात्रा सर्वाधिक हैं। (ऊपरी पानी या सतही पानी)

अरब सागर में गिरने वाली नदियां निम्न हैं:-

  • सोम, माही, जाखम, अनास, चाप, मोरने, लूनी, लीलड़ी, सूकड़ी, मीठड़ी, जवांई, सगाई, बाण्डी, जोजड़ी/जोजरी, साबरमति, पष्चिमी बनास

माही नदी:-

  • इसका उद्गम मध्यप्रदेष में धार जिले के पास अममोरू की पहाडियों में मेहद झील से होता हैं।
  • माही नदी का बहाव पष्चिम में बहते हुए दक्षिण से बांसवाड़ा में प्रवेष करती हैं, उत्तर में बहती हैं, फिर पष्चिम मं बहती है। फिर दक्षिण-पष्चिम में बहते हुए खम्मात की खाड़ी में गिरती हैं।
  • माही नदी डुंगरपुर-बांसवाड़ा के बीच सीमा बनाती हैं।
  • डुगरपुर में सोम-माही-जाखम के संगम पर बेणेष्वर मेला भरता हैं।
  • इस मेले को आदिवासियों का कुंभ कहते हैं, यह मेला माघ की पूर्णिमा को भरता हैं।
  • इस मंदिर का निर्माण मावजी ने किया था।
  • मावजी को बागड़ के धणी/मालिक कहते हैं।
  • मावजी ने माही नदी के किनारे तपस्या की थी।

माही बजाज सागर बांध/जमनालाल बजाज सागर बांध:-

  • राजस्थान व गुजरात की संयुक्त परियोजना, इस बांध से उत्पन्न बिजली राजस्थान में मिलती हैं। 140 मेगावाट, बांसवाड़ा में स्थित हैं।
  • गुजरात व डुंगरपुर की सीमा पर स्थित कड़ाना बांध (माही नदी पर) पर निर्मित बिजली गुजरात को, बांध का निर्माण गुजरात के द्वारा करवाया गया हैं।
  • इस बांध से नर्मदा नहर को पानी मिलेगा।
  • बांसवाड़ा में माही नदी के किनारे परमाणु विद्युत परियोजना स्थापित की जा रही हैं। यह परियोजना थोरियम पर आधारित होगी।
  • जमनालाल बजाज महात्मा गांधी के पांचवे पुत्र थे। यह गांधीजी के वित्त पोषक थे।

जाखम नदी:-

  • इसका उद्गम प्रतापगढ़ में छोटी सादड़ी से होता हैं।
  • डुंगरपुर में माही नदी मंे मिलती हैं।
  • इस नदी पर प्रतापगढ़ में जाखम बांध बनाया गया हैं।
  • इस बांध का निर्माण जनजाति उपयोजना के अंतर्गत किया गया हैं जिसका उद्देष्य प्रतापगढ़, बांसवाड़ा के आदिवासी क्षेत्र का विकास करना हैं।

सोमनदी:-

  • इसका उद्गम उदयपुर में बाबलवाड़ा की पहाड़ियों में बीछामेड़ा नामक स्थान से (ऋषभदेव के पास) से निकलती हैं।
  • डुंगरपुर में जाखम में मिलती हैं।
  • सोम कागढ़र परियोजना उदयपुर में स्थित हैं। (बांध)
  • सोम कमला अम्बा परियोजना डूंगरपुर में हैं। (गांव)

लूनी नदी:-

  • इसका उद्गम स्थल अजमेर में नाग की पहाड़ियों से होता हैं।
  • इसका बहाव अजमेर, नागौर, पाली, जोधपुर, बाड़मेर, जालौर में बहते हुए गुजरात में प्रवेष करती हैं।
  • इसका उपनाम सरस्वती, साकरी (साक्री) हैं।
  • बालोतरा तक यह नदी मीठी हैं। इसके बाद इसका पानी खारा हो जाता हैं।
  • बाड़मेर के बालोतरा तक इसकी लम्बाई 250 किलोमीटर हैं।
  • बालोतरा से जालौर तक की लम्बाई 150 किलोमीटर हैं। (जालौर से बाहर निकलती हैं)

सहायक नदियां:-
जोजरी/जोजड़ी (भीतरी/भीदड़ी):-

  • नागौर के दक्षिण भाग से उद्गम व जोधपुर में बहते हुए दक्षिण-पष्चिम में बाड़मेर में प्रवेष करती हैं।
  • सिवाना (बाड़मेर) के पास लूनी में गिरती हैं।
  • यह नदी अरावली से नहीं निकलती हैं। इसकी लम्बाई 150 किलोमीटर है।
  • सहायक नदियों में सबसे लम्बी नदी हैं।

लीलड़ी नदी:-

  • इसका उद्गम पाली में सोजत के पहाड़ों से निकलती हैं और पाली के पास लूनी में मिलती हैं।

बांडी नदी:-

  • इसका उद्गम अरावली के पष्चिम की पहाड़ियों में फुलाद नामक स्थान से निकलती हैं व पाली के पास लुनी में गिरती हैं।

सूकड़ी:-

  • इसका उद्गम स्थल पाली जिले में देसूरी से होता हैं।
  • यह बाड़मेर में समदड़ी के पास लूनी नदी में गिरती हैं।

जवांई नदी:-

  • सिरोही में आबू पर्वत के उत्तरी ढ़ाल से निकलती हैं।
  • पाली में इस नदी पर (सुमेरपुर में) जवांई बांध स्थित हैं, जिसका निर्माण जोधपुर के महाराजा उम्मेदसिंह ने करवाया।
  • इस बांध से पाली, जोधपुर को पीने का पानी व सिंचाई उपलब्ध होती थी।
  • नहर, जवांई बांध से जोधपुर तक
  • इस बांध में पानी की आपूर्ति के लिए उदयपुर में सेई नदी के पानी को बांध में इकट्ठा किया जा रहा हैं।
  • इस बांध से एक भूमिगत नहर निकाली जा रही हैं, जो जवांई बांध के लिए पानी की आपूर्ति करेगा।
  • सेई परियोजना के पूर्ण होने पर जालौर व सिरोही को जवाई बांध से पानी मिलेगा।
  • सगाई, मिठड़ी नदियां पाली में अरावली की पहाड़ियों से निकलती हैं।
  • जोधपुर में लूनी में गिरती हैं। सहायक यहीं तक हैं।
  • गुजरात का दीसा पष्चिमी बनास पर स्थित हैं।

पष्चिमी बनास:-

  • इसका उद्गम सिरेाहीं में दक्षिण की पहाड़ियों से आबू पर्वत के दक्षिण से निकलती हैं।
  • इस नदी का सम्पूर्ण पानी गुजरात को मिलता हैं।

सबारमती:-

  • इसका उद्गम उदयपुर में कोटरा नामक स्थान से होता हैं।
  • इसका पानी सम्पूर्ण रूप से गुजरात को मिलता हैं।
  • नोट:- लूनी नदी कच्छ के रण में गिरती हैं, पष्चिमी बनास कच्छ की खाड़ी (लिटिल रण), साबरमती व माही खम्भात की खाड़ी में गिरती हैं।

आंतरिक प्रवाही नदियां:-
घग्घर नदी:-

  • यह हिमाचल प्रदेष के षिवालिक की पहाड़ियों से निकलती हैं।
  • हरियाणा में बहते हुए हनुमानगढ़ मंे प्रवेष करती है।
  • जब यह नदी पूरे उफान पर होती थी तब इसका पानी पाकिस्तान में बहावलपुर मंे फोर्ट अब्बास (अब्बास किला) तक जाता था।
  • इसका उपनाम नाली, मृत/मृण, दृष्द्वती/सरस्वती, चोतांग (सहायक नदी) हनुमानगढ़ घग्घर नदी के पैटे के नीचे स्थित हैं।
  • इस नदी के किनारे हड़प्पा सभ्यता का विकास हुआ हैं।
  • कालीबंगा, राखीगढ़ी, घग्घर नदी के किनारे स्थित थे।
  • वैदिककाल में घग्घर नदी के किनारे वेदों की रचना हुई
  • पाकिस्तान में इसकों घग्घर-हाकरा कहते हैं।

कांतली:-

  • इसका उद्गम सीकर में खण्डेला की पहाड़ियों से होता हैं।
  • सीकर में इस नदी के किनारे ताम्रपाषाणकालीन नगर गणेष्वर का टीला स्थित हैं।
  • यह नदी झुन्झनु जिलमें चिड़ावा के पास समाप्त हो जाती हैं।

अन्य आंतरिक नदियां:-
साबी:- अलवर, जयपुर में बहती हैं, हरियाणा में लुप्त हो जाती हैं।
रूपारेल:- अलवर से निकलती हैं, भरतपुर में बहती हैं और उत्तरप्रदेष में लुप्त हो जाती हैं।

मानसून और जलवायु

मानसून:-

  • मानसून एक विषेष प्रकार की हवा होती हैं, जो अपने निष्चित मार्ग पर 6 महिने स्थल से जल की ओर एवं 6 महीने जल से स्थल की ओर चलती हैं।
  • यह हवा अपने निष्चित मार्ग पर चलती हैं।
  • मनसूनी हवाओं की खोज हिप्पालस ने की थी।
  • राजस्थान में बंगाल की खाड़ी और अरब सागर की मानसून की शाखाओं से वर्षा होती हैं।
  • भारतीय मानसून की उत्पत्ति हिन्द महासागर से होती हैं।
  • राजस्थान की भौगोलिक स्थिति भारत के पष्चिम में हैं। अरब सागर से 400 किलोमीटर दूर हैं इसलिए अरब सागर की शाखा राजस्थान में सबस पहले पहुंचती हैं।
  • अरब सागर की शाखा से दक्षिण राजस्थान में डुंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, सिरोही, राजसमन्द, भीलवाड़ा में वर्षां होती हैं।
  • अरावली की स्थिति मानसूनी हवाओं के समानांनतर होने के कारण राजस्थान में वर्षां कम होती हैं।
  • राजस्थान में वर्षां कम होने के कारण वनस्पति का अभाव व कमी, अत्यधिक गर्मी व मरूस्थल, अवरोधक का अभाव हैं।
  • राजस्थान के पूर्वी भाग में बंगाल की खाड़ी व अरब सागर की दोनो शाखाओं से होती हैं।
  • उत्तर-पूर्व में अरब सागर की शाखा व बंगाल की खाड़ी की शाखा आपस में मिलती हैं, इसलिए यहां वर्षां की औसत मात्रा अधिक होती हैं।
  • सिरोही व झालावाड़ में सर्वांधिक वर्षां होती हैं।
  • माउन्ट आबू में राजस्थान में सर्वांधिक वर्षां होती हैं, सर्वांधिक आद्र्र स्थान व सर्वाधिक वर्षां वाला स्थान।
  • सर्वांधिक वर्षां वाला जिला:- झालावाड़, सर्वाधिक आद्र्रतम जिला।
  • जुलाई (35%) और अगस्त (30%) के महीने में राजस्थान में सर्वांधिक वर्षां होती हैं।
  • हिन्दमहासागर में उत्पन्न होने वाले मानसून को दक्षिण पष्चिमी मानसून कहते हैं।

 

मानसून का प्रत्यावर्तन (निवर्तन)/लौटना (षीतकालीन मानसून):-

  • इस मानसून की उत्पत्ति भूमध्य सागर से होती हैं, नवम्बर, दिसम्बर में भूमध्यसागर से ठण्डी हवाएं भारत की ओर चलती हैं।
  • जिससे शीतकाल में भारत के उत्तर-पष्चिम में वर्षां होती हैं, जिसे राजस्थान में मावठ/महावट कहते हैं।
  • इस अवधि में (नवम्बर, दिसम्बर, जनवरी) जम्मू कष्मीर, हिमाचल प्रदेष में बर्फ गिरती हैं, जिससे उत्तर भारत में सर्दी बढ़ जाती हैं एवं शीतलहर चलती हैं।
  • राजस्थान के उत्तरी जिलों में शीतकाल में सर्वांधिक वर्षां होती हैं। जैसे:- गंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर, चुरू, झुन्झनु आदि।
  • दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पष्चिम की ओर जाने पर वर्षां की मात्रा, वनस्पति की मात्रा में कमी आएगी।
  • वनस्पति वर्षां का अनुसरण करती हैं।
  • दक्षिण से उत्तर की ओर जाने पर वर्षां व वनस्पति में कमी आएगी।
  • पूर्व से पष्चिम की ओर जाने पर वर्षां व वनस्पति में कमी आएगी।
  • दक्षिण-पष्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर जाने पर वर्षां में वृद्धि व तापमान में कमी आएगी।

राजस्थान की जलवायु का वर्गीकरण:-

  • उष्णकटिबंधीय (अधिक तापमान) शुष्क जलवायु प्रदेष
  • उष्णकटिबंधीय अर्द्धषुष्क जलवायु वाले प्रदेष
  • उष्ण कटिबंधीय उपआद्र्र जलवायु वाले प्रदेष
  • उष्ण कटिबंधीय आद्र्र जलवायु वाले प्रदेष
  • उष्ण कटिबंधीय अति आद्र्र जलवायु वाला प्रदेष (सिरोही/झालावाड़)

उष्ण कटिबंधीय शुष्क जलवायु वाला प्रदेष:-

  • सीमावर्ती मरूस्थलीय जिलों में जैसे:- गंगानगर, बीकानेर, हनुमानगढ़, जैसलमेर, बाड़मेर, पष्चिमी जोधपुर।
  • कोपेन ने इस जलवायु प्रदेष के लिए नाम दिया।
  • इस प्रदेष में औसत ग्रीष्मकाल का तापमान 350 होता हैं, औसत शीतकालीन तापमान 120 होता हैं।
  • इस प्रदेष का वार्षिंक औसत तापमान 250 होता हैं।
  • (480 (अधिकतम) $ 20 (न्यूनतम) = 50 » 2)
  • इस प्रदेष में सूर्य की किरणें सर्वांधिक तिरछी पड़ती हैं। (कर्क रेखा से सबसे दूर)
  • सबसे सीधी बांसवाड़ा, सबसे तिरछी रेखा गंगानगर में (सूर्य की किरणें)
  • वर्षां की मात्रा 10 से 20 सेमी. तक होती हैं।

अर्द्धषुष्क जलवायु वाला प्रदेष:-

  • अरावली के पष्चिमी भाग में चुरू, झुन्झनु, सीकर, पाली, जालौर, जोधपुर, नागौर व बाड़मेर के पूर्वी भाग में फैली हुई हैं।
  • कोपेन ने इस प्रदेष के लिए (BWHW) नाम दिया।
  • इस प्रदेष में वर्षां की मात्रा 20 से 40 सेमी. तक होती हैं।
  • ग्रीष्म ऋतु में तापमान लगभग 360 सेल्सियस व शीतकाल में 1-150 सेल्सियस होता है। (औसत)
  • शीतकाल में इस प्रदेष में कभी-कभी पानी भी जम जाता हैं।
  • कांटेदार झाडियां पाई जाती हैं, ऐसी वनस्पति को स्टेपी/स्टेप्स कहते हैं।
  • घास के मैदान पाए जाते हैं, जिन्हे बीड़ कहते हैं।
  • इस प्रदेष से 1 वर्षं में 18 दिन वर्षां होती हैं। (औसत)
  • सर्वांधिक वर्षां 1 वर्ष में 40 दिन जिला झालावाड़ तथा उसके बाद बांसवाड़ा में 35 से 38 दिन तक होती हैं।
  • सर्वाधिक वर्षां वाला स्थान माउण्ट आबू हैं।

उपआद्र्र जलवायु वाला प्रदेष:-

  • राजस्थान के उत्तरी-पूर्वी भाग में जयपुर, अजमेर, टोंक, दौसा, भीलवाड़ा, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, सवांईमाधोपुर, सिरोही, राजसमन्द, पाली का पूर्वी भाग
  • इस प्रदेष में वर्षां की मात्रा 40 से 60 सेमी. तक होती हैं।
  • नोट:- अर्द्ध शुष्क व उप आद्र्र के मध्य 50 सेमी. वर्षां वाली सीमा रेखा हैं। अरावली में वर्षां की मात्रा 50 सेमी. रहती हैं।
  • ग्रीष्मकाल में औसत तापमान 28.320 c तथा शीतकाल में 120 C होता हैं।
  • इस प्रदेष में शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते हैं, जो मिश्रित प्रकार के होते हैं।
  • इस प्रदेष में शीतकाल में चक्रवात से वर्षां होती हैं।

आद्र्र-जलवायु वाला प्रदेष:-

  • बांरा, कोटा, चित्तौड़गढ़, बांसवाड़ा, उदयपुर, भरतपुर, धौलपुर, सवांईमाधोपुर, करौली के सीमावर्ती प्रदेष।
  • यहां वर्षां की मात्रा 60 से 80 सेमी. होती हैं।
  • तपमान ग्रीष्मकाल में 30.320ब् व शीतकाल में 100ब् होता हैं।
  • मिश्रित पतझड़ प्रकार की वनस्पति पाई जाती हैं, जिसे शुष्क पर्णपाती वन या मानूसनी वन भी कहते हैं।
  • इस प्रदेष को कोपेन ने (CWG) नाम दिया हैं।

अतिआद्र्र जलवायु वाला प्रदेष:-

  • दक्षिणी-पूर्वी सीमावर्ती भाग:- झालावाड़, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, माउण्टआबू।
  • वर्षां की मात्रा 100 से 150 सेमी. होती हैं।
  • यहां पर मानसूनी वनस्पति पाई जाती हैं।
  • ग्रीष्मकाल में तापमान 28.300 C व शीतकाल में 100 C रहता हैं।
  • कोपेन ने इस प्रदेष को (AW) का नाम दिया हैं।

 

 

मिट्टियां

  • राजस्थान के दक्षिण में लाल मिट्टी माई जाती हैं।
  • दक्षिण-पूर्व में काली मिट्टी पाई जाती हैं।
  • उत्तरी-पूर्वी व पूर्वी मैदानी भाग में जलोढ़ मिट्टी पाई जाती हैं।
  • उत्तर में (गंगानगर, हनुमानगढ़) में जलोढ़ मिट्टी पाई जाती हैं।
  • पष्चिम में/उत्तर-पष्चिम में बलुई मिट्टी पाई जाती हैं।
  • अरावली के पष्चिमी ढ़ाल में भुरी-धूसर/भुरी-बलुई/सिरोजम मिट्टी पाई जाती हैं।
  • अरावली के पूर्व में बनास नदी में भुरी-दोमट मिट्टी पायी जाती हैं।

 

राजस्थान में मिट्टियों के प्रकार:-
1. बालु मिट्टी 2. लाल दोमट/लाल लोमी मिट्टी
3. मिश्रित लाल-काली मिट्टी 4. जलोढ़ मिट्टी या कच्छारी मिट्टी
5. भुरी-रेतीली मिट्टी (अरावली के पष्चिम में) 6. भुरी रेतीली कच्छारी मिट्टी 7. काली मिट्टी

बालु मिट्टी:-

  • राजस्थान में सर्वांधिक पाई जाने वाली मिट्टी।
  • सीमावर्ती चारों जिलों गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, शेखावटी क्षेत्र, जोधपुर, नागौर में पायी जाती हैं।
  • इस मिट्टी में जीवाष्म और नाइट्रोजन का अभाव होता हैं, क्योंकि इस प्रदेष में गर्मी अधिक पड़ती हैं व वर्षां की मात्रा कम हैं।
  • लवणता व क्षारीयता की मात्रा सर्वांधिक पाई जाती हैं। इसको कम करने के लिए जिप्सम व चूना पत्थर ड़ाला जाता हैं।
  • अम्लीय मिट्टी का च्ी मान 0 से 6.9 तक होता हैं। (चूना पत्थर से अम्लीयता कम होती हैं)
  • क्षारीय मिट्टी का च्ी मान 7.1 से 14 तक होता हैं। (जिप्सम से क्षारीयता कम होती हैं।)
  • इस मिट्टी में वर्षां व सिंचाई की सुविधा होने पर सर्वाधिक उपजाऊ हैं।
  • बालू मिट्टी में जलधारण करने की क्षमता कम होती हैं (सबसे कम होती हैं), क्योंकि मिट्टी के मध्य छिद्र अधिक व बड़े होते हैं। (जल सोखने की क्षमता सर्वांधिक होती हैं)
  • बालू मिट्टी की मुख्य समस्या सोडियम क्लोराईड हैं।
  • बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, पाली, नागौर की मिट्टीयों में लवणता अधिक हैं।
  • लवणता के कारण बंजर भूमि का क्षेत्रफल सर्वांधिक पाली में हैं।
  • पष्चिमी राजस्थान की मुख्य फसलें:- मूंग, मोठ व बाजरा हैं।

लाल मिट्टी:-

  • इसके अन्य नाम लाल लोमी/चिकनी/दोमट हैं।
  • जहां आग्नेय चट्टान होगी, वहां यह मिट्टी पाई जाएगी।
  • राजस्थान के दक्षिण में लाल मिट्टी का क्षेत्रफल सर्वांधिक हे।
  • चित्तौड़गढ़ (सर्वांधिक), डुंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर, भीलवाड़ा के आंतरिक भागों में (प्राचीन स्फट्कीय व कायांतरित चट्टानों से निर्मित)
  • इसका लाल रंग लौह आॅक्साइड के कारण होता हैं।
  • मिट्टी में फास्फोरस, नाइट्रोजन, ह्ययूमरस (नमी, जैविक अंष) की कमी पाई जाती हैं।
  • यह मिट्टी में मक्का (सर्वांधिक), मुंगफली, चावल, दालें, अफीम की खेती के लिए उपयोगी हैं।
  • अफीम सर्वांधिक चित्तौड़गढ़ में होता हैं।

काली मिट्टी:-

  • काली मिट्टी का निर्माण बैसाल्ट चट्टानद के टूटने से होता हैं।
  • ज्वालामुखी के उद्गार से (लावा – जमेगा – बेसाल्ट – टूटी – काली मिट्टी) (आग्नेय चट्टान)
  • इसकी जल धारण करने की क्षमता सर्वांधिक हैं।
  • इस मिट्टी का काला रंग लौह-आॅक्साइड के कारण होता हैं।
  • राजस्थान में काली मिट्टी का विस्तार – कोटा, बूंदी, बांरा, झालावाड़ तक हैं।
  • हाड़ौती में पहले बांरा शामिल नहीं था।
  • राजस्थान में काली मिट्टी मालवा का पष्चिमी विस्तार हैं।
  • इस मिट्टी में कपास, सोयाबीन, मैथी (पीली), सरसांे सर्वांधिक होता हैं।
  • कपास के कारण इसे कपासी कहते हैं।
  • पानमैथी की विषिष्ट किस्म मसुरी नागौर के ताऊसर में सर्वांधिक होती हैं।
  • हाड़ौती को सोयाप्रदेष भी कहते हैं, सोयाबीन कोटा में सर्वांधिक होता हैं।
  • सोयाबीन में प्रोटीन (40%) , तेल(20%), खल (40%) तक होते हैं।
  • सोयाबीन से दूध भी बनता हैं।
  • काली मिट्टी को दक्षिण भारत में रेगुर कहते हैं, भारत से बाहर चर्नोजम कहते हैं।

 

काली-लाल मिट्टी:-

  • यह मिट्टी लाल व काली के मध्य वाले क्षेत्र में पाई जाती हैं।
  • भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, उदयपुर, राजसमन्द, बूंदी, चम्बल नदी के पष्चिम में पाई जाती हैं।
  • इसमें कपास, गन्ना, चावल सर्वांधिक होता हैं।
  • सर्वांधिक गन्ना बूंदी में होता हैं।

जलोढ़ मिट्टी (कच्छारी, कांप, दोमट):-

  • इस मिट्टी का निर्माण नदियों के द्वारा होता हैं।
  • विष्व की सर्वांधिक उपजाऊ मिट्टी हैं।
  • राजस्थान में यह मिट्टी अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, सवांईमाधोपुर, जयपुर, दौसा (उत्तरी-पूर्वी मैदानी भाग) में पायी जाती हैं।

बनास बेसिन:-

  • इस मिट्टी में सभी प्रकार की फसले होती हैं।
  • यह मिट्टी सर्वांधिक खाद्यान्न उत्पादन करने वाली मिट्टी हैं।
  • इस मिट्टी के चार रूप:- खादर, बांगर, भामर, तराई हैं।
  • भामर व तराई राजस्थान में नहीं पाये जाते हैं।
  • खादर नवीन जलोढ़ मिट्टी हैं, जबकि बांगर पुरानी जलोढ़ मिट्टी हैं।
  • जलोढ़ मिट्टी का नदी में बाढ़ आने पर नवीनीकरण होता हे।

भूरी मिट्टी:-
यह मिट्टी दो प्रकार की होती हैं:-
1. भूरी धूसर/धूसर रेगिस्तानी 2. भूरी दोमट मिट्टी

  • अरावली के पष्चिम में भूरी रेगिस्तानी रेतीली मिट्टी (लूनी बेसिन) में पायी जाती हैं।
  • अरावली के पूर्व में भूरी दोमट मिट्टी (बनास बेसिन), भीलवाड़ा, अजमेर, टोंक तथा जयपुर के दक्षिण में पायी जाती हैं।
  • इस मिट्टी में कुछ मात्रा में जैविक अंष पाया जाता हैं, क्योंकि बनास बेसिन की नदियों के द्वारा पहाड़ी मिट्टी बहाकर मैदान में बिछा दी जाती हैं।
  • इस मिट्टी में ज्वार, दाले सर्वांधिक होती हैं।

भूरी रेतीली मिट्टी:-

  • इसमें फास्फोरस की मात्रा अधिक होती हैं।
  • इसे भूरी धूसर मिट्टी या धूसर रेगिस्तानी मिट्टी कहते हैं।
  • इसका विस्तार अरावली के पष्चिम में जालौर, बाड़मेर (सिवाना,
  • समदड़ी, पंचमद्रा) पाली, डेगाना, परबतसर (नागौर), सीकर जिलों में लूनी नदी बेसिन में पाई जाती हैं।
  • इस मिट्टी में अरण्डी, तिल (सर्वांधिक), सरसों, जीरा आदि की खेती होती हैं।इस मिट्टी में नाइट्रोजन, फाॅस्फोरस, पौटेषियम की कमी पाई जाती हैं।

नोट:-

  • राजस्थान के उत्तर-पष्चिम में आंतरिक अपवाह तंत्र वाले भागों में नदियों के आसपास भूरी-रेतीली कच्छारी मिट्टी पाई जाती है।
    जीरा सर्वांधिक जालौर एवं नागौर में पाया जाता हैं।
    अरण्डी, तिल (काली व सफेद दोनों) सर्वांधिक पाली में पाई जाती हैं।
    वर्ष के अधिकांष महीनों का तापमान 180 C रहता हैं।

 

वनस्पति
राजस्थान में सामान्य रूप से उष्ण कटिबंधीय वनस्पति पाई जाती हैं।

ऊँचाई पर पाई जाने वाली वनस्पति उपोष्ण कटिबन्धीय कहलाती हैं। जिसमें शीतोष्ण व उष्ण दोनो वनस्पति की विषेषताएँ होती हैं, इसलिए उपोष्ण कहते हैं।

वनस्पति का वर्गीकरण:-
शुष्क सागवान वन:-

  • सगवान का पेड़ मानसूनी जलवायु/मानसूनी वनस्पति का पेड़ हैं (सागवान सर्वांधिक भारत में) जो शुष्क पर्णपाती वनों के अंतर्गत आता हैं।
  • राजस्थान में सागवान के पेड़ डुंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर, चित्तौड़गढ़ में पाए जाते हैं। जो राजस्थान के कुल वन क्षेत्र का 7 % हैं। अर्थात् 7 % भाग परसागवान के वन पाए जाते हैं।
  • सागवान के पेड़ बांसवाड़ा वन मण्डल में सर्वांधिक पाए जाते हैं।
  • राजस्थान में कुल 13 वन मण्डल हैं, सबसे बड़ा वन मण्डल जोधपुर वन मण्डल हैं। (पूरा पष्चिमी क्षेत्र इसी में आता हैं)

मिश्रित वन:-

  • अरावली के सम्पूर्ण पूर्वी भाग में पाए जाते हैं, इसके अन्तर्गत ढ़ाक, खैर, धोकड़ा, महुआ, पलास आदि पाए जाते हैं।
  • इस प्रकार की वनस्पति सीमावर्ती क्षेत्रों में सर्वाधिक घनी हैं। जैसे:- सिरोही, उदयपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़गढ़, कोटा, बांरा, सवंाईमाधोपुर, करौली, धौलपुर (इन सभी क्षेत्र में 20 % से अधिक वन क्षेत्र हैं)

ढ़ाक:-

  • ढ़ाक के पतल बनाए जाते हैं।
  • ढ़ाक के पेड़ टोंक, सवांईमाधोपुर, अलवर, जयपुर, बांरा, झालावाड़ में सर्वांधिक पाए जाते है।

खैर:-

  • खैर के छाल से कत्था बनता हैं।
  • खैर के पेड़ उदयपुर, राजसमन्द, चित्तौड़गढ़, कोटा, टोंक, झालावाड़ मेकं सर्वांधिक पाए जाते हैं।

धोकड़ा/धोक:-

  • उत्तरी-पूर्वी राजस्थान में सर्वांधिक पाया जाता हैं। इससे कृषि के औजार बनाए जाते हैं।
  • अलवर, भरतपुर, करौली, सवांईमाधोपुर, चित्तौड़गढ़ आदि जिलो में पाया जाता हैं।
  • इससे लकड़ी का कोयला/काष्ठ कोयला बनाया जाता हैं।

अरडु:-

  • सवांई माधोपुर, बांरा, करौली, कोटा में सर्वांधिक पाया जाता हैं।
  • यह एक मुलायम पेड़ होता हैं। जिसका प्रयोग माचिस, कठपुतलियाँ, गणगौर बनाने में किया जाता हैं।

महुआ:-

  • राजस्थान के दक्षिणी-पूर्वी जिलों के सीमावर्ती क्षेत्रों में सर्वांधिक पाया जाता हैं।
  • यह आदिवासीयों का सबसे प्रिय पेड़ हैं।
  • इससे शराब बनती हैं, इसके फल-फूल खाए जाते हैं।

बांस:-

  • बांस एक प्रकार की घास हैं, विष्व की सबसे लम्बी घास व तीव्र गति से बढ़ने वाली घास, रात में सर्वांधिक वृद्धि, मक्का भी रात में सर्वांधिक वृद्धि करता हैं।
  • इसे आदिवासियों का हरा सोना कहते हैं।
  • राजस्थान के दक्षिण मंे सर्वांधिक पाए जाते हैं।

अन्य पेड़:- सीताफल, बैर, पीपल, जामुन, तेदुं।

तेदुं:-

  • इसके पत्ते से बीड़ी बनती हैं
  • इसके पेड़ सर्वांधिक अजमेर, टोंक, राजसमन्द, अलवर, भीलवाड़ा में पाए जाते हैं।

शुष्क वन:-

  • इस वनस्पति को जेराफाइट/मरूस्थलीय वनस्पति कहते हैं।
  • इस वनस्पति में पत्ते कांटो के रूप में, जड़े गहरी, छाल मोटी व कठोर पाई जाती हैं।
  • जैसे:- रोहिड़ा, कैर, साल, कुमटा, बबुल, नागफनी, कैक्ट्स आदि।
  • शुष्क वनों का अत्यधिक कठोर होने का मुख्य कारण अत्यधिक गर्मी हैं।

नोट:-

  • अरावली के पष्चिम में वनों का अनुपात सबसे कम हैं।
  • चुरू में 0.5 %, बाड़मेर में 1.5%, जोधपुर में 1 %, बीकानेर में 4.6%, गंगानगर व हनुमानगढ़ में 4.2%, झुन्झनु में 6.8 %, पाली में 7.4%
  • जैसलमेर में बाड़मेर की तुलना में वनों का क्षेत्रफल सर्वांधिक हैं।
  • सिरोही में वनों का प्रतिषत (घनत्व) 31% हैं।
  • उदयपुर व राजसमन्द का क्षेत्रफल 29.4% हैं।
  • सवांईमाधोपुर व करौली का 27.6% है।
  • कोटा व बांरा का 28.8% हैं।
  • झालावाड़ का 21%, धौलपुर का 21%, बांसवाड़ा का 23.6%
  • चित्तौड़गढ़ का 24.3%
  • राजस्थान में वनों का क्षेत्रफल 9.4%-9.32% हैं।

उष्णकटिबंधीय (आद्र्र उष्ण सदाबहार वनस्पति):-

  • इस प्रकार की वनस्पति राजस्थान के दक्षिण में बांसवाड़ा, उदयपुर, प्रतापगढ़, सिरोही के सीमावर्ती क्षेत्र में पायी जाती हैं।
  • इसके अंतर्गत बांस, सागवान, आम के पेड़ सर्वांधिक पाए जाते हैं।

नोट:- राजस्थान की कुल वनस्पति का 16 % भाग उदयपुर में पाया जाता हैं।

वनस्पति से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु:-

  • राजस्थान में आरक्षित वनों (मानवीय हस्तक्षेप नहीं) का प्रतिषत 39 % हैं।
  • राजस्थान में संरक्षित सुरक्षित वनों का प्रतिषत 51 % हैं। (चराई, कटाई)
  • राजस्थान में अवर्गीकृत वनों का प्रतिषत 10 % हैं।
  • किसी भी प्रदेष में 1/3 भाग पर वन होना आवष्यक हैं।

ओरण:-

  • धार्मिंक आस्था से जुड़ा वन क्षेत्र हैं।
  • जहां वनों की कटाई धार्मिंक आस्था के कारण नहीं होती हैं।

खस:-

  • यह एक विषेष प्रकार की सुगन्धित घास होती हैं।
  • जिसके बीज का उपयोग शर्बत/ठंडाई बनाने में किया जाता है।
  • यह भरतपुर, सवांईमाधोपुर (सर्वांधिक) व टोंक में सर्वांधिक होती हैं।

गोंद:-

  • बाड़मेर के चोहटन का प्रसिद्ध हैं, जो राजथान से बाहर निर्यात होता हैं।
  • चित्तौड़गढ़, उदयपुर, अलवर, सिरोही, अजमेर, जोधपुर में सालर के पेड़ सर्वांधिक पाए जाते हैं, जिसका उपयेाग पैकिंग का समान बनाने में करते हैं। जैसे:- लकड़ी की पेटियां

राजस्थान में 13 वन मण्डल हैं:-
चित्तौड़गढ़, बांसवाड़ा, उदयपुर, सिरोही, अजमेर, कोटा, बांरा, टोंक, बूंदी, झालावाड़, जयपुर, भरतपुर, जोधपुर (सबसे बड़ा)।
सर्वांधिक घना वन मण्डल /सर्वांधिक वन वाला क्षेत्र:- उदयपुर

  • सर्वांधिक घनी वनस्पति वाला जिला:- सिरोही (घना वन वाला जिला)

सन् 1992 में जापान की सहायता से अरावली वृक्षारोपण कार्यक्रम शुरू किया गया।

समाजिक वानिकी:-
लोगों के द्वारा सरकारी भवनों के आसपा, सड़क के किनारे, रेल लाईनों के किनारे, घरों के आसपास तथा सरकार द्वारा ग्राम पंचायतों को बंजर भूमि दी जाती हैं, जहां ग्रामीण जनता द्वारा वृक्षारोपण किया जाता हैं। इसे सामाजिक वानिकी कहते हैं।

  • सन् 1992 में उदयपुर वन मण्डल द्वारा वनों की रक्षा के लिए अरावली देव वन संरक्षण अभियान चलाया गया।
  • इसका उद्देष्य वनों का संरक्षण करना था।
  • धोकड़ा के पेड़ राजस्थान के कुल पेड़ो का लगभग 60% हैं।
  • रोहिड़ा के पेड़ सर्वांधिक जोधपुर में हैं।
  • कुमटा के पेड़ सर्वांधिक जोधपुर में हैं, इसके फल की सब्जी बनती है।
  • सर्वांधिक खेजड़ी नागौर में पायी जाती हैं। इसका वैज्ञानिक नाम प्रेसेपिस सिनेरिया हैं।

 

  • रोहिड़ा का वैज्ञानिक नाम:- टिकोमेल अंडुलेटा है।
  • चिंकारा का वैज्ञानिक नाम:- गजेला-गजेला है।
  • गोड़वाना का वैज्ञानिक नाम:- क्रायोटिपस नाइग्रिसेप्स हैं।
  • कीकर:- सर्वांधिक कीकर शेखावटी क्षेत्र में होते हैं।

गोड़वाना पक्षी:-

  • ग्रेट इण्डियन बर्ड़ भी कहते हैं।
  • गांव में इसे मालमोरड़ी कहते हैं।
  • गोड़ावन पक्षी राष्ट्रीय मरू उद्यान जैसलमेर में सर्वांधिक हैं।
  • इसके अलावा मोरसन (बांरा), सोखलिया (अजमेर) में गोड़ावन पक्षी के लिए सुरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया हैं।

खनिज सम्पदा

  • राजस्थान खनिजों की किस्म की दृष्टि से प्रथम स्थान पर हैं।
  • राजस्थान में सभी प्रकार के खनिज पाए जाते हैं, कुछ खनिज ज्यादा, कुछ कम।
  • राजस्थान के दक्षिण में खनिजों की किस्म व मात्रा दोनों सर्वांधिक हैं।
  • पष्चिमी राजस्थान में धात्विक खनिज न्यनतम हैं।
  • दक्षिण राजस्थान में धात्विक खनिजों की मात्रा सर्वांधि हैं जैसे:- तांबा, सीसा-जस्ता आदि।
  • उत्तरी राजस्थान/उत्तरी-पूर्वी राजस्थान में तांबा की मात्रा सर्वांधिक हैं, झुन्झनु, सीकर, अलवर में।
  • 2007 में राजस्थान के लगभग सभी पूर्वी जिला मंे तांबे के भण्डार खोजे गए हैं।

वे खनिज जिनके खनन में राजस्थान का पहला स्थान हैं निम्न हैं:-
 वोलेस्टोनाइट  मार्बल  सीसा-जस्ता
 एस्बेस्ट्स  फ्लोराइड  घीया पत्थर
 जिप्सम  सेण्ड स्टोन  कोटा स्टोन
 कैल्साइट  फेल्सपार  चांदी

नोट:-
थोरियम (आणिवक खनिज), तामड़ा (गारनेट), वुुलेस्टेनाइट, जास्पर के खनन में राजस्थान का एकाधिकार हैं।
विष्व का लगभग 80 % भारत में, जिसमें से 60% राजस्थान में हैं।

खनिजों का वर्गीकरण
लोहा:-

  • राजस्थान में घटिया किस्म का हेमेटाइट लोहा पाया जाता हैं। जिसका औद्योगिक उपयोग नहीं हैं।
  • यह मोरिजा-बानोल (जयपुर में), चैंमू-सामौद, नीमला-रायसेल (जयपुर व दौसा के मध्य) में पाया जाता हैं।
  • डाबला-सींघना (नागौर व सीकर के बीच), भूर-हुण्डेर (उदयपुर में)
  • नाथरा की पाल (उदयपुर में)
  • अन्य उत्पादक जिलें:- बांसवाड़ा, भीलवाड़ा, डुंगरपुर
  • जयपुर प्रथम स्थान पर एवं उदयुपर दूसरे स्थान पर हैं।

मैगनीज:-

  • राजस्थान मैगनीज के उत्पादन में सर्वांधिक पिछड़ा हुआ हैं।
  • बांसवाड़ा में सर्वांधिक भण्डार हैं, इसके अलावा सवांईमाधोपुर, जयपुर, अलवर में इसका भण्डारण हैं।

सीसा-जस्ता (गेलेना):-

  • सान्द्र सीसा-जस्ता (विषेषकर जस्ता) का उत्पादन केवल राजस्थान में ही निकाला जाता हैं।
  • सीसा-जस्ता हमेषा जुड़वा खनिज हैं या साथ-साथ निकलते हैं।
  • सीसा-जस्ता के साथ चांदी भी निकलती हैं।

इसके उत्पादक जिले निम्न हैं:-
 उदयपुर में:-  जावर की खान  मोचिया मगरा
 बरोड़ मगरा  राजपुरा दरीबा
 ऋषभदेव  देबारी

 डुंगरपुर में:- माण्डो की पाल , घूघरा की पाल

  • भीलवाड़ा में सीसा जस्ते का केन्द्रीकरण (घनत्व) सर्वांधिक व सर्वोत्तम किस्म का हैं।
  • भीलवाड़ा के रामपुरा-अगुचा में सर्वोत्तम किस्म का खनिज पाया जाता हैं।
  • हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड के द्वारा उदयपुर के देबारी, चित्तौड़गढ़ के चन्देरिया में जिंक परिषोधन संयंत्र स्थापित हैं।
  • सवांईमाधोपुर में चैथ का बरवड़ा नामक स्थान पर स्थित हैं।
  • अलवर में गुढ़ा किषोर में भी भण्डारण हैं।
  • सर्वोत्तम किस्म का सीसा-जस्ता रामपुरा-आगुचा (भीलवाड़ा) में पाया जाता हैं।
  • सर्वांधिक मात्रा उदयपुर में हैं।

एसबेस्ट्स (उदयपुर):-

  • यह सामरिक (रक्षा) महत्व का खनिज हैं। (हवाई जहाज, जलयान) जिससे कुछ विषेष प्रकार की विकिरण निकलती हैं, जो पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं।
  • इससे तापरोधी वस्तुएँ भी बनायी जाती हैं।
  • इसका उत्पादन उदयपुर, डुंगरपुर, भीलवाड़ा, अजमेर में होता हैं।
  • उदयपुर में:- जाजरा की पाल
  • बरौली में एस्बेस्ट्स का केन्द्रीयकरण सर्वांधिक हैं।

डुंगरपुर में:- 1.  देवल 2. पीपरदा 3. जकोल

  • घंटीगला में केन्द्रीयकरण हैं।

चांदी:-

  • चंदी उत्पादन में राजस्थान का पहला स्थान हैं।
  • उदयपुर में सर्वांधिक चांदी का खनन होता हैं, इसके अलावा डुंगरपुर, बांसवाड़ा, राजसमन्द में चांदी का खनन होता हैं।

टंगस्टन:-

  • राजस्थान भारत का एकमात्र राज्य हैं जहां वर्तमान में टंगस्टन का खनन हो रहा हैं।

इसके उत्पादक जिले निम्न हैं:-
1. नागौर में:-   डेगाना – भाकरी – सेवरिया – पिपलिया – बीजाथल

2.  सिरोही में:-  वाल्दा, रेवदर

3.  पाली में:-  चानाबेड़ा – मोरीबेड़ा -  नानाक्ररारावाब

  • टंगस्टन का उपयोग बल्ब का तंतु बनाने मंे किया जाता हैं।
  • टंगस्टन उत्पादन का कार्य राजस्थान राज्य टंगस्टन विकास निगम के द्वारा किया जाता हैं।

यूरेनियम:-

  • यह एक आण्विक खनिज हैं।
  • भीलवाड़ा के जहाजपुर व टोंक के देवली के मध्य पट्टी में पाया जाता हैं।
  • भीलवाड़ा में सर्वांधिक यूरेनियम (भीलवाड़ा के कुराड़िया गांव) में पाया जाता हैं।
  • इसके अलावा डुंगरपुर, बांसवाड़ा, किषनगढ़ (अजमेर) में पाया जाता हैं।
  • उदयपुर, बूंदी, टोंक, सीकर में नए भण्डार खोजे गए हैं।

थोरियम:-

  • राजस्थान थोरियम में प्रथम स्थान पर हैं।
  • सर्वांधिक उत्पादन बांसवाड़ा में होता है।
  • डुंगरपुर, चित्तौड़गढ़ व प्रतापगढ़ में भी उत्पादन होता हैं।

चूना-पत्थर:-

  • यह सर्वव्यापी खनिज हैं जो राजस्थान के लगभग सभी जिलों में पाया जाता हैं।
  • सर्वोत्तम किस्म का चूना पत्थर जैसलमेर जिले में सर्वांधिक पाया जाता हैं।
  • जैसलमेर में भारत का 14 % चूने के भण्डार हैं।
  • इसके अलावा जोधपुर, जालौर, सवांईमाधोपुर, बूंदी, नागौर, उदयपुर आदि जिलों में भी सर्वांधिक चूना-पत्थर पाया जाता हैं।
  • चूना-पत्थर अवसादी चट्टान हैं।

तामड़ा (गारनेट):-

  • यह अर्द्धबहुमूल्य हैं।
  • राजस्थान के इसमें एकाधिकार हैं।
  • इसे रक्तमणि भी कहते हैं।

इसके उत्पादक जिले निम्न हैं:-
टोंक में:-  देवली , राजमहल , गोवरी

  • अजमेर में सरवाड़ तामड़ा के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • यह सर्वांधिक अजमेर व भीलवाड़ा में पाया जाता हैं।
  • भीलवाड़ा में दादिया, कमल खेड़ा/कमलपुरा, बलिया खेड़ा में पाया जाता है।
  • सीकर में बागेष्वर क्षेत्र में पाया जाता हैं।

पन्ना:-

  • यह बेरेलियम व एल्युमिनियम का एक जटिल यौगिक हैं।
  • इसमें राजस्थान का एकाधिकार हैं, यह अर्द्ध-बहुमूल्य है।
  • हरे रंग का होता है, इसलिए इसे हरि अग्नि भी कहते हैं।

इसके उत्पादक जिले निम्न हैं:-
1. उदयपुर में ः-  कालागुमान , माली
2. राजसमन्द में ः-  रेलमगरा
3. पाली में ः-  देसुरी , मारवाड़ जंक्षन (खारची)
चित्तौड़गढ़ में देवगढ़ हैं।

  • ब्रिटेन की माइन्स मेनेजमेण्ट कम्पनी द्वारा राजसमन्द व अजमेर के बीच पन्ना का विषाल भण्डार खोजा गया हैं।

अभ्रक (अधात्विक):-
यह ताप का सुचालक व विद्युत का कुचालक हैं।

इसके उत्पादक जिले निम्न हैं:-
1. भीलवाड़ा (सर्वांधिक) 2. उदयपुर 3. चित्तौड़गढ़
4. डुंगरपुर 5. सीकर 6. अजमेर
7. पाली 8. जयपुर

भीलवाड़ा में अभ्रक की ईंटे बनती है जिसका उपयोग तापरोधी भट्टियों में होता हैं।

फेल्सपार:-यह अभ्रक की खानों से निकलता हैं और राजस्थान में भारत का लगभग 60 % खनन होता हैं।

इसके उत्पादक जिले निम्न हैं:-
अजमेर में मकरेसा पहले स्थान पर हैं, जहां से 90 % उत्पादन होता हैं।
 पाली  उदयपुर  बांसवाड़ा  टोंक  सीकर

राॅक-फाॅस्फेट (उर्वरक):-

  • इसका उपयोग रासायनिक खाद बनाने में किया जाता हैं।  डाई अमोनियम फास्फेटद्ध
  • उदयपुर के झामर कोटड़ा (एषिया की सबसे बड़ी खान), सीसर्मा, भीण्डर जैसलमेर में वीरमानया, लाठी
  • बांसवाड़ा, पाली, अलवर, जयपुर में भी पाया जाता हैं।

नोट:- कपासन (चित्तौड़गढ़) में राॅक फाॅस्फेट आधारित रासायनिक खाद का कारखान स्थापित किया गया हैं।

फ्लोराइट/फ्लोराइड:-

  • मांडो की पाल (डुंगरपुर) फ्लोराइट की एषिया की सबसे प्रमुख खान हैं।
  • भीलवाड़ा के असींद में एवं उदयपुर के झालरा में पाया जाता हैं।

चीनी मिट्टी/मृत्तिका:-

  • यह सर्वांधिक जयपुर में पायी जाती हैं।
  • इसके अलावा धौलपुर, सीकर, दौसा में भी पायी जाती हैं।
  • इसका उपयोग ग्लास (कांच) बनाने में किया जाता है।

संगमरमर:-

  • यह कायांतरित चट्टान हैं जो अवसादी का रूपान्तर हैं।
  • सर्वश्रेष्ठ संगमरमर नागौर के मकराना में पाया जाता हैं। (ताजमहल के निर्माण में भी इसका ही उपयोग हुआ था)
  • सर्वांधिक उत्पादन राजसमंद में होता हैं।
  • उदयपुर, अजमेर, सिरोही, चित्तौड़गढ़ में भी उत्पादन होता हैं।
  • सेखा-पेखा (सिरोही) उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं।

इमारती पत्थर:-

  • सर्वांधिक जोधपुर में पाया जाता हैं।
  • जैसलमेर में पीला पत्थर पाया जाता हैं।
  • धौलपुर में लाल पत्थर पाया जाता हैं। (लाल किला)
  • करौली में लाल पत्थर पाया जाता हैं।
  • पाली में ग्रे पत्थर (खण्ड़ा)
  • सवांईमाधोपुर में कोटा स्टोन (सर्वांधिक) पाया जाता हैं।
  • काला ग्रेनाइट-भैंसलाना (जयपुर) में पाया जाता हैं।
  • सतरंगी संगमरमर उदयपुर में पाया जाता हैं।
  • चीतीद्वार संगमरमर सिरोही में पाया जाता हैं।
  • गुलाबी संगमरमर (ग्रेनाइट) जालौर में पाया जाता हैं।
  • हरा संगमरमर उदयपुर में पाया जाता हैं।

सोना:-

  • राजस्थान में सोने का खनन नहीं होता हैं, लेकिन सोने के भण्डार खोजे गए हैं।
  • खनन के लिए राजस्थान सरकार और आॅस्टेªलिया की इण्डो-गोल्ड कम्पनी के बीच बातचीत चल रही हैं।

खोजे गए क्षेत्र निम्न हैं:-

  • बांसवाड़ा व प्रतापगढ़ के मध्य आनन्दपुर मुकिया
  • सिरोही में बसंतगढ़, अजारी, गोलिया (पुराने क्षेत्र)

नए खोजे गए क्षेत्र निम्न हैं:-
 बांसवाड़ा  धौलपुर  डुंगरपुर  झुन्झनु  सीकर

नोट:- सोना स्वतंत्र अवस्था में पाया जाता हैं।

घीया पत्थर:-

  • यह उदयपुर में सर्वांधिक पाया जाता हैं एवं इसके उत्पादन में उदयपुर का एकाधिकार हैं।
  • इसका उपयोग किटनाषक दवाईयाँ बनाने, खिलौने बनाने में व श्रृंगार प्रसाधन बनाने में किया जाता हैं।

बेरिलियम:-

  • एक विषेष प्रकार की मिट्टी जैसा खनिज, जिसका आण्विक उपयोग होता हैं।
  • राजस्थान के दक्षिण के जिले उदयपुर, डुंगरपुर, भीलवाड़ा में सर्वांधिक हैं।
  • इसके अलावा जयपुर, सीकर व अलर में भी पाया जाता हैं।

वुलस्टेनाइट:-

  • यह 100 % राजस्थान में पाया जाता हैं तथा इसके उत्पादन में राजस्थान का एकाधिकार हैं।
  • इसका उत्पादन उदयपुर, सिरोही, डुंगरपुर, अजमेंर व भीलवाड़ा में होता हैं।

बेराइट्स:-

  • यह चट्टानों के मध्य पायी जाने वाली एक विषेष प्रकार की मिट्टी जैसा खनिज हैं।
  • राजस्थान में इसका उत्पादन उदयपुर, अलवर, भरतपुर, अजमेर व सीकर में सर्वांधिक होता है।
  • अनार्थिक होने के कारण इसका खनन कम होता हैं।

जिप्सम (हरसौंठ):-

  • पष्चिम के मरूस्थल में सर्वांधिक पाया जाता हैं।
  • यह सागरीय अवषेष हैं।
  • राजस्थान का इसके खनन में पहला स्थान हैं।
  • इसके उत्पादक जिले निम्न हैं:-

बीकानेर में जामसर:-

  • यह राजस्थान खान खनिज विकास निगम की सबसे बड़ी खान हैं, लेकिन वर्तमान में इसमें उत्पादन कम हो गया हैं।
  • बिसरासर की खान हनुमानगढ़ में, जहां वर्तमान में सर्वांधिक खनन होता हैं।
  • नागौर जिप्सम के सर्वांधिक जमाव वाला जिला हैं।भण्डारण की दृष्टि से यह पहले स्थान पर हैं।

इसका उपयोग खाद बनाने व भूमि की क्षारीयता को कम करने में किया जाता हैं।
इसका उपयोग सीमेंट व प्लास्टर आॅफ पेरिस (POP) बनाने में भी किया जाता हैं।

जालौर:- ग्रेनाइट के भण्डारण की दृष्टि से पहले स्थान पर है।

ग्रीन स्टोन क्षेत्र के अंतर्गत:- तांबा व सोने के भंडारण वाला क्षेत्र ग्रीन स्टोन क्षेत्र कहलाता हैं।

  • सीकर के सलादीपुर मे पायराइट्स के सर्वांधिक भंडार पाये जाते हैं।
  • पाली के नाना करारावाब क्षेत्र में टंगस्टन के भंडार पाए जाते हैं।
  • राजपुरा दरीबा सीसा-जस्ता के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • उदयपुर के झामर कोटड़ा में राॅक फाॅस्फेट के भंडार पाए जाते हैं।
  • खेतड़ी सिंघना क्षेत्र तांबा के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • खो-दरीबा (अलवर) तांबे के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • खेतड़ी में हिन्दुस्तान काॅपर लिमिटेड के द्वारा तांबा परिषोधन संयंत्र तथा दरीबा
    में सान्द्र तांबा गलाने का कारखाना स्थित हैं।
  • हिन्दुस्तान काॅपर लिमिटेड, हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड, सांभर साॅल्ट लिमिटेड, इन्स्ट्रुमेकटेषन लिमिटेड, माॅर्डन बेक्ररी (जयपुर) स्थित है।
  • हिन्दुस्तान मषीन टुल्स (अजमेर में) स्थित हैं।
  • ये सभी भारत सरकार के उपक्रम हैं।

 

उद्योग

राजस्थान उद्योगों की दृष्टि से अत्यधिक पिछड़ा हुआ हैं। कारण पानी की कमी, बिजली की कमी, सरकारी नीतियां।

वस्त्र उद्योग:-

  • राजस्थान का सबसे पुराना उद्योग हैं तथा राजस्थान का कृषि पर आधारित सबसे बड़ा उद्योग हैं।
  • सूती वस्त्र उद्योग की शुरूआत दामोदर दास द्वारा 1889 में ब्यावर में द कृष्णा मिल स्थापित करके की गई थी (19 वीं शताब्दी का अंतिम दषक)।

दूसरी मिल एड़वर्ड मिल – स्वदेषी आंदोलन के दौरान (1906 में) स्थापित की गई।
तीसरी मिल:- 1925 में महालक्ष्मी मिल स्थातिप की गई
यह तीनो मिले ब्यावर में स्थापित की गई।

भीलवाड़ा में मेवाड़ टेक्सटाइल मिल 1938 में स्थापित कि गई।
1942 में महाराजा उम्मेद मिल (पाली में) स्थापित की गई।
यह राजस्थान की सबसे बड़ी मिल हैं। (मजदूरों व उत्पादन की दृष्टि से)
वर्तमान में विवादित हैं (सर्वांधिक विवादित मिल)
कारण:- पानी की कमी

  • वस्त्र उद्योग के कारण पाली राजस्थान का सर्वांधिक जल-प्रदूषित नगर हैं।
    1960 में भीलवाड़ा में स्पिनिंग एण्ड विविंग मिल की स्थापना की गई (कताई, बुनाई मिल की स्थापना)
    भीलवाड़ा को वस्त्र उद्योग के कारण राजस्थान का मेनचेस्टर कहते हैं।
    भीलवाड़ा में पाॅवर लूम के क्षेत्र में कम्प्यूटर एडेड डिजाइन सेंटर की स्थापना सन् 1993 की जा चुकी हैं।
    वर्तमान में 23 बड़ी वस्त्र मिलें हैं।
    सन् 1949 में इनकी संख्या 7 थी।
    अधिकांष मिलें निजी क्षेत्र की हैं, जिनकी संख्या 17 हैं।

तीन मिले सहकारी क्षेत्र की हैं जो निम्न हैं:-

सहकारी कताई, बुनाई मिल:-

  • यह भीलवाड़ा में गुलाबपुरा में सन् 1966 में स्थापित की गई
  • सभी कपास उत्पादन करने वाले बड़े किसान उस मिल के सदस्य हैं,
  • इन्ही किसानों से ये पास खरीदती हैं।

सहकारी कताई बुनाई मिल:- गंगापुर (भीलवाड़ा में) सन् 1981 में स्थापित
की गई थी।

गंगानगर सहकारी कताई मिल:-

  • यह सन् 1978 में हनुमानगढ़ में स्थापित की गई थी।
    इसके द्वारा किसानों से तथा सहकारी समितियों से कपास खरीदी जाती हैं।
    सन् 1993 में इन तीनों मिलों का एकीकरण कर राजस्थान स्पिनिंग विविंग फेडरेषन की स्थापना की गई।
    संघ का नाम:- स्पिनफेड (राज. स्पि. विवि. फेड.)
    उद्देष्य:- किसानों से कपास खरीदना व वस्त्र मिलों में कपास की आपूर्ति करना।
    वस्त्र उत्पादन में राजस्थान आत्मनिर्भर नहीं हैं, अधिकांष वस्त्र सूरत से आते हैं।

चीनी उद्योग:-
चीनी उत्पादन में राजस्थान का स्थान नहीं हैं। इसमें यह अत्यधिक पिछड़ा हुआ हैं।
कारण:-

  • गन्ना नहीं (आद्र्र जलवायु)
  • उष्ण कटिबंधीय जलवायु
  • अत्यधिक गर्मी।

चीनी उद्योग तीनों क्षेत्रों में स्थापित की गई हैं।
निजी, सहकारी और सरकारी
द मेवाड़ शुगर मिल, भोपाल सागर (चित्तौड़गढ़) में 1932 में स्थापित की गई।

निजी क्षेत्र की पहली मिल निम्न हैं:-

  • गंगानगर शुगर मिल सन् 1945 में स्थापित व सन् 1956 में सरकार के हाथ में आ गई। यह सार्वजनिक मिल हैं।
  • सन् 1945 में बीकानेर औद्योगिक निगम लिमिटेड के द्वारा इसकी स्थापना की गई।
  • यह एक मात्र मिल, जहां चुकन्दर से चीनी बनाई जाती हैं।
  • गंगानगर शुगर मिल के द्वारा कोटा, उदयपुर में शराब बेची जाती हैं।
  • चीनी की बची हुई खोई से गंगानगर, अजमेर, जोधपुर, अटक (बांरा) में देषी शराब बनती हैं।
  • धौलपुर में हाइटेक ग्लास फैक्ट्री के द्वारा बोतले बनाई जाती हैं।
  • इन सबका संचालन गंगानगर शुगर मिल करती हैं।
  • केषवरायपाटन शुगर मिल सन् 1965) में बूंदी में स्थापित की गई।
  • यह सहकारी चीनी मिल हैं, जो वर्तमान में बंद हैं।
  • कम से कम 10 व्यक्ति मिलकर एक सहकारी समिति स्थापित कर सकते हैंे।
  • सहकारी आंदोलन विष्व में सर्वप्रथम जर्मनी में शुरू हुआ।

सीमेण्ट उद्योग:-

  • चित्तौड़, सिरोही, अजमेर, कोटा राज्य में उत्पादन होता हैं।
  • सन् 2007 में राजस्थान सीमेण्ट उत्पादन में पहले स्थान पर था।
  • सन् 2008 में दूसरे स्थान पर हैं। आंध्रप्रदेष पहले स्थान पर एवं मध्यप्रदेष दूसरे स्थान पर हैं।
  • सीमेण्ट उद्योग के मुख्य कच्चे माल की दृष्टि से राजस्थान अत्यधिक सम्पन्न हैं।
  • मुख्य कच्चा माल:- चूना पत्थर
  • राजस्थान में चित्तौडगढ़ इस उद्योग के लिए सर्वाधिक अनुकूलित जिला हैं तथा सीमेण्ट उद्योग की सम्भावनाओं वाले जिले जैसलमेर, जालौर, झुन्झनु, नागौर, सीकर आदि हैं।
  • सीमेण्ट का पहला कारखाना सन् 1915 में लाखेरी (बूंदी) में स्थापित किया गया।;।ब्ब्द्ध
  • इसकें बाद चित्तौड़गढ़ में चेतक सीमेण्ट का कारखाना स्थापित किया गया।
  • कोटा में मंगलम सीमेण्ट का कारखाना स्थापित किया गया।
  • ब्यावर में श्री सीमेन्ट का कारखाना स्थापित हैं। (ब्यावर में शुष्क प्रोसेसिंग द्वारा सीमेंट का उत्पादन किया जाता हैं)
  • इस इकाई को बांगड़ प्रतिष्ठान/इकाई कहते हैं। (श्री) जे.के.सीमेन्ट उदयपुर के डबोक में व चित्तौड़गढ़ के निम्बाहेड़ा व पीण्डवाड़ा (सिरोही में) स्थापित हैं।
  • कोटा में श्रीराम सीमेन्ट, मंगलम् सीमेन्ट (मोड़क स्थान) स्थापित हैं।
  • श्रीराम् की सभी इकाईयां कोटा में स्थापित हैं।
  • सवांईमाधोपुर में जयपुर उद्योग लिमिटेड के द्वारा एषिया का सबसे बड़ा सीमेण्ट कारखाना स्थापित किया गया हैं।

 

सफेद सीमेण्ट:-

  • नागौर के गोटन में जे.के.व्हाइट सीमेंट के नाम से स्थापित किया गया हैं।
  • एषिया का पहला सफेद सीमेंट का कारखाना हैं जो सन् 1982 में स्थापित किया गया।
  • खारिया खंगार (जोधपुर में) सफेद सीमेण्ट कारखाना निर्माणाधीन हैं। यह सफेद सीमेण्ट का सबसे बड़ा कारखाना हैं।

बिनानी सीमेण्ट:- पिनवाड़ा सिरोही में (पिण्डवाड़ा)
आदित्य सीमेण्ट:- चित्तौड़गढ़ में
नोट:- चित्तौड़गढ़ (निम्बाहेड़ा) का सर्वाधिक उत्पादन करने वाला कारखाना जे.के.सीमेण्ट हें।
श्रीराम सीमेण्ट कोटा सबसे कम उत्पादन करने वाली इकाई हैं।
सवांईमाधोपुर में बंद पड़ी इकाई को शीघ्र शुरू किया जा रहा हैं।

नमक उद्योग:-

  • राजस्थान झीलों से नमक उत्पादन में पहले स्थान पर हैं।
  • भारत में झील से नमक उत्पादन में सांभर का पहला स्थान हैं।यह भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की झील हैं।
  • सांभर जयपुर व नागौर के बीच में स्थित हैं जो फूलेरा तहसील में आता हैं।
  • नमक उत्पादन का कार्य सांभर साॅल्ट लिमिटेड के द्वारा किया जाता हैं।
  • यह इकाई हिन्दुस्तान साॅल्ट लिमिटेड की सहायक इकाई हैं।
  • हिन्दुस्तान साॅल्ट लिमिटेड भारत सरकार का उपक्रम हैं।

सांभर से नमक उत्पादन का कार्य दो प्रकार से होता हैं:-
1. क्यारी के द्वारा नमक उत्पादन 2. वर्षां जल के द्वारा नमक उत्पादन

डीडवाना (नागौर में):-

  • इस झील का नमक खाने योग्य नहीं हैं।
  • इस झील से औद्योगिक नमक उत्पादन किया जाता हैं।

राजस्थान सरकार साॅल्ट वक्र्स द्वारा यहां पर दो इकाईयां स्थापित की गई हैं -
1. सोडियम सल्फेट 2. सोडियम सल्फाइट
यहां से उत्पादित नम का उपयोग तेजाब बनाने में, रंगरोगन में, कागज बनाने में, वस्त्र उद्योग में व विभिन्न प्रकार के रसायन बनाने में किया जाता हैं।

पंचपदरा/पंचमद्रा (बाड़मेर):-

  • इस झील में नमक का घनत्व सर्वांधिक हैं।(.90%)
  • यहां स्फीटिक (डली) नमक बनाया जाता हैं।
  • नमक बनाने का काम खारवाल जाति के लोग करते हैं।
  • स्फीटिक नमक बनाने के लिए एक झाड़ी का उपयोग किया जाता हैं।
  • (मोरली की झाड़ी)
  • नमक उत्पादन का कार्य निजी व सरारी दोनों स्तर पर होता हैं।

अन्य नमक उत्पादक झीलें:-

  • पोकरण:- यह जैसलमेंर जिले में स्थित हैं। यहां पर सर्वोत्तम किस्म का नमक उत्पादित किया जाता हैं।
  • कावोद की झील जैसलमेर में स्थापित हैं।
  • बीकानेर में लूणकरनसर की झील जो अब लुप्त हो चुकी हैं।
  • सीकर जिले में नीम का थाना मंे स्थित झील।
  • नागौर जिलें में कुचामन सिटी में स्थित झील।

 

छोटे उद्योग
वनस्पति घी उद्योग:-

  • भीलवाड़ा में वनस्पति घी बनाने का कारखाना सबसे पहला व सर्वांधिक हैं।
  • इसके अलावा जयपुर, टोंक, चित्तौड़गढ़, उदयपुर, गंगानगर में भी कारखाने स्थापित हैं।
  • जयपुर में महाराजा वनस्पति घी व आमेर ब्रांड घी बनाने का कारखाना स्थापित हैं।
  • वनस्पति घी बनाने में हाइड्रोजन गेस काम में ली जाती हैं।
  • ब्रेड बनाने में, केक बनाने में – ब्व्2 (फूलने वाली चीजें जैसे – रोटी)

ग्रेनाइट उद्योग:-

  • यह जालौर, सिरोही, पाली व बाड़मेर में स्थापित हैं।

कीटनाषक दवाई उद्योग:-

  • यह गंगानगर, जयपुर, कोटा व उदयपुर में स्थापित हैं।

गंधक से तेजाब:-

  • यह अलवर, सीकर, खेतड़ी, चन्देरिया (चित्तौड़गढ़) में स्थापित हैं।

रुपये छापने वाली स्याही:-

  • यह अलवर जिले के भिवाड़ी में उत्पादित की जाती है। वोटिंग स्याही का निर्माण भी यहीं किया जाता हैं।
  • इसका निर्माण सिल्वर नाइट्रेट से किया जाता हैं।

इटालियन ज्वैलरी उद्योग:-

  • अर्द्धबहुमूल्य पत्थरों से आभूषण बनाकर निर्यात किये जाते हैं व कच्चा माल बाहर से मंगाया जाता हैं।
  • इटालियन ज्वैलरी उद्योग जयपुर का प्रसिद्ध हैं।

सिरेमिक उद्योग:-

  • यह बीकानेर जिले के खारा में स्थापित हैं।
  • जयपुर, आबूरोड़, कोटा, अजमेर आदि में भी इसका उत्पादन होता हैं।

विस्फोटक सामग्री उद्योग (बारूद):-

  • धौलपुर में (राजस्थान सरकार द्वारा संचालित) स्थापित हैं। यह कई सालों से बंद था।

टी.वी.उद्योग:-

  • यह कोटा में स्थापित हैं। यहा ट्यूब बनाने का कार्य किया जाता हैं।
  • केबल इण्डस्ट्री भी कोटा में ही स्थापित हैं।
  • मषीनरी उद्योग कोटा में स्थापित हैं। (हल्की मषीनरी उद्योग)

टायर, ट्यूब उद्योग:- कांकरोली, राजसमन्द, कोटा

  • टी.वी.एण्टीना, डिस्क, बच्चों के झूले बनाने सम्बन्धित उद्योग फालना पाली में स्थापित हैं।
  • छतरियों के निर्माण सम्बन्धित उद्योग फालना पाली में स्थापित हैं।
  • J.K. सिन्थेटिस्क उद्योग कोटा में स्थापित हैं।
  • श्रीराम रेयान उद्योग कोटा में स्थापित हैं।
  • पानी, बिजली के मीटर का उत्पादन जयपुर एवं पाली में किया जाता हैं।
  • बिजली के मीटर का उत्पादन केवल जयपुर में किया जाता हैं।
  • अवन्ती स्कूटर, लेलेण्ड ट्रक का उत्पादन अलवर में किया जाता हैं।
  • वैगन फैक्ट्री (बड़ी लाईन के डिब्बे) का उत्पादन कोटा में किया जाता हैं।
  • रेल के डिब्बे का उत्पादन (सिमको वेगन फैक्ट्री) भरतपुर में किया जाता हैं।
  • सल्फयूरिक एसिड प्लांट अलवर में स्थापित हैं।
  • हाथ से कागज उत्पादन का कारखाना सांगेनर (जयपुर) व घोसुण्डा (उदयपुर) में स्थापित हैं।
    घोसुण्डा में वैष्णव र्ध में षिलालेख मिलें हैं। (बेसनगर, मोरी (मध्यप्रदेष में))
  • बेसनगर का षिलालेख हेलियोडोरस ने लिखाया व भागवत धर्म स्वीकार किया (दूत बनकर शुंग शासक भागभद्र के दरबार में आया था)
  • सांगानेर में राष्ट्रीय कागज संस्थान (हाथ कागज) स्थित हैं।

गुड़ और खाण्डसारी (षक्कर) उद्योग:-

  • जयपुर, अलवर, भरतपुर, कोटा में इनका उत्पादन किया जाता हैं।

माचिस उद्योग:- अजमेर, टोंक, अलवर में इनका उत्पादन किया जाता हैं।

बीड़ी उद्योग:- यह टोंक में स्थापित हैं।

  • माचिस की तिलियां अरडु के पेड़ से बनती हैं।

पीतल और तांबे के बर्तनः- जयपुर, जोधपुर, भरतपुर, पाली, किषनगढ़ में इनका उत्पादन होता हैं।

  • एल्युमिनीयम के बर्तन का उत्पादन जोधपुर में होता हैं।
  • एल्युमिनीयम का अयस्क बाॅक्साइट हैं।
  • लकड़ी के प्लाई बोर्ड़ का उत्पादन कोटा, घोसुण्डा, उदयपुर, बांसवाड़ा में होता है।

चमड़ा उद्योग:- जोधपुर, जालौर, बीकानेर, नागौर

चमड़े की जूतियां:- जोधपुर में।

  • नागरी जूतियों की एक किस्म हैं।
  • सर्वांधिक प्रसिद्ध जूतियाँ (जालौर के भीनमाल की हैं)
  • जोधपुर की व नागौर के बड़ु की प्रसिद्ध हैं। यहां (नागौर) जूती उद्योग को बढ़ावा दिया गया हैं।
  • बांस के फर्नीचर जयपुर, अजमेर, जोधपुर में बनाए जाते हैं।

लाख उद्योग:- उदयपुर, चित्तौड़गढ़, बूंदी, झालावाड़, सवांईमाधोपुर, धौलपुर में स्थित हैं यहां लाख एकत्र करने का काम किया जाता हैं।
लाख के आभूषण:- जयपुर व उदयपुर में।

पी.वी.सी. (पाॅली विनाईल क्लोराइड):- कोटा, जयपुर

नाप-तौल के यंत्र:- कोटा में

उर्वरक उद्योग:- कोटा, उदयपुर

कृत्रिम रेषम:- कोटा, बांसवाड़ा, जयपुर, गुलाबपुरा (भीलवाड़ा में)

स्टेट वूलन मिल:- बीकानेर में, यहां पर ऊनी धागा बनाया जाता हैं। यह वर्तमान मंे बंद हैं।

स्टेट टेनरिज उद्योग:- टोंक में (लेदर उद्योग)

  • डूंगरपुर में फ्लोस्पार, बेनिफिसिएषन संयंत्र स्थापित हैं। (मांड़ो की पाल में)
  • सन्1978 में स्थापित राजकान का उद्देष्य लघु उद्यमियों को विपण, प्रबन्धकीय एवं तकनीकी मददन देना।
  • राजस्थान जनजाति क्षेत्रीय विकास सहकारी संघ की स्थापना सन् 1976 में की गई।
  • गैर परम्परागत ऊर्जा के स्त्रोतों के विकास हेतु 21 जनवरी, 1985 को RED  संस्था स्थापित की गई।

वित्तीय संस्थाएँ

रिकों (RICOO)

  • रिकों की स्थापना सन् 1969 में हुई (राजस्थान राज्य उद्योग एवं खनिज विकास निगम की स्थापना की गई)।
  • सन् 1979 में खनिज विकास निगम से अलग कर दिया गया।
  • सन् 1980 में इसका नाम RICO रखा गया।

रिकों के निम्नलिखित कार्यं हैं:-

  • उद्योगों के लिए प्रोजेक्ट तैयार करना।
  • औद्योगिक क्षेत्रों का निर्धारण करना
  • औद्योगिक बस्तियां स्थापित करना।
  • तकनीकी मार्गदर्षन देना।
  • अन्य औद्योगिकी इकाईयों के शेयर खरीदना।
  • उद्योगों के लिए तकनीकी व प्रबन्ध की व्यवस्था करना।

राजस्थान वित्त निगम/राज्य वित्त निगम

  • इसकी स्थापना सन् 1955 में की गई

उद्देष्य:-

  • औद्योगिक इकाईयों को वित्तीय सहायता उपलब्ध करवाना एवं ऋण देना।
  • ये दीर्घकालीन ऋण देती हैं तथा अन्ये बैंको के द्वारा ऋण की गारण्टी देना।

राजस्थान लघु उद्योग निगम (RAJSICO):-

  • इसकी स्थापना सन् 1961 में की गई।

उद्देष्य:-

  • लघु उद्योगो तथा हस्तषिल्प इकाईयों की स्थापना करना।
  • सभी षिल्पग्राम RAJSICO द्वारा स्थापित।
  • पाल षिल्पग्राम जोधपुर, उदयपुर, माउण्ट आबू।

राजस्थान की परियोजनाएँ
-  सिंचाई परियोजनाऐं –   जल-विद्युत परियोजनाऐं
-   ताप-विद्युत परियोजनाऐं  -  अन्य विद्युत परियोजनाऐं:- पवन ऊर्जा, बायोगैस

सिंचाई परियोजनाऐं

चम्बल नदी घाटी परियोजना:-

  • पहली पंचवर्षीय योजना के दौरान स्थापित बहुउद्देष्यीय परियोजना हैं।
  • जो राजस्थान व मध्यप्रदेष की संयुक्त परियोजना हैं।
  • इस परियोजना के अन्तर्गत तीन बांध बनाए गए हैं, जो निम्नलिखित हैं:-
  • गांधी सागर बांध (मध्यप्रदेष के मन्दसौर जिले में):-
  • इस बांध से सिंचाईं नहीं होती हैं।

 

राणाप्रताप सागर बांध (चित्तौड़गढ़ में):-

  • इससे भी सिंचाई नहीं होती हैं, केवल बिजली बनती हैं।

जवाहर सागर बांध (कोटा में):-

  • कोटा बैराज -कोटा में स्थापित हैं। इस बांध से नहरे
  • निकाली गई हैं। इस बांध के अन्तर्गत 8 लिफ्ट नहर हैं, जिनसे कोटा व
  • बांरा को सिंचाई उपलब्ध होती हैं।
  • सवांईमाधोपुर में चम्बल नदी पर इंदिरा लिफ्ट परियोजना स्थित है। जिससे सवांईमाधोपुर, करौली को सिंचाई व पेयजल मिलता हैं।
  • सर्वाधिक अपवाह तंत्र:- झालावाड़
  • सर्वाधिक बहाव क्षेत्र:- बहाव क्रमष चित्तौड़गढ़, कोटा, बूंदी, सवांईमाधोपुर,
  • करौली, धौलपुर में होता हैं।

माही नदी घाटी परियोजना:-

  • यह सन् 1971 में स्थापित की गई।
  • यह राजस्थान व गुजरात की संयुक्त परियोजना हैं।
  • यह बांसवाड़ा में स्थित है।

बंाध का नाम:- ‘जमनालाल बजाज सागर परियोजना’

  • कड़ाना बांध जो गुजरात व डुंगरपुर की सीमा पर स्थित हैं।
  • जमनालाल बजाज सागर बांध का निर्माण राजस्थान सरकार द्वारा किया गया हैं।
  • इस बांध से बांसवाड़ा, डूंगरपुर को पेयजल व सिंचाई उपलब्ध होती हैं।
  • माही नदी का 60ः पानी राजस्थान को मिलता हैं।
  • कड़ाना बांध का निर्माण गुजरात सरकार द्वारा करवाया गया।
  • कड़ाना बांध से नर्मदा नहर को पानी मिलेगा।

नर्मदा नहर:-

  • सरदार सरोवर से निकाली गई हैं। इसकी लम्बाई 458 किलोमीटर हैं।
  • इस नहर में पानी मार्च 2008 में छोड़ा गया था।
  • यह पानी जालौर के शील गांव तक पहुंचा।
  • इस नहर से जालौर का सांचैर व बाड़मेर की गुढ़ामलानी तहसील सिंचित होगी।
  • कालांतर में सम्पूर्ण बाड़मेर, जालौर व सिरोही को सिंचाई के लिए पानी मिलेगा।
  • यह राजस्थान की एकमात्र परियोजना हैं, जिसमें फव्वारों से सिंचाई होगी।
  • इस नहर को कड़ाना बांध व दोतीवाड़ा बांध (गुजरात, पष्चिमी बनास) से पानी मिलेगा।

जवांई बांध:-

  • पाली के सुमेरपुर तहसील में जवांई नदी पर स्थित हैं।
  • इसका निर्माण जोधपुर के महाराजा उम्मेद सिंह ने करवाया।
  • इसके इंजीनियर मोतीसिंह थे।
  • इसके निर्माण का उद्देष्य जोधपुर व पाली शहर को पीने पानी उपलब्ध करवाना था।

सेई परियोजना:-

  • उदयपुर की घाटियों में सेई नदी पर एक बांध बनाया गया हैं। जिसका पानी इकट्ठा करके भूमिगत नहर के द्वारा जवांई बांध के लिए भेजा जाएगा।
  • जो गैर-मानसून अवधि में पीने का पानी व सिंचाई उपलब्ध करवाएगा।

बीसलपुर बांध:-

  • बनास नदी पर टोंक में टोड़ारायसिंह तहसील के पास स्थित हैं।
  • यह बांध अभी भी निर्माणाधीन हैं।
  • इसका निर्माण विष्व बैंक की सहायता से किया जा रहा हैं।
  • बीसलपुर बांध से अजमेर व जयपुर को पीने का पानी उपलब्ध होगा।
  • इस बांध का विाद टोरड़ी सागर की जलापूर्ति से संबंधित था। (2005 में विवाद हुआ जब सोहेला में पुलिस द्वारा लोगो पर गोलियां चलाई गई)
  • गोलीकाण्ड की जांच अनुपचन्द गोयल द्वारा की जा रही हैं।

ईसरदा बांध (ईसरदा):-

  • बनास नदी पर सवांईमाधोपुर व टोंक के मध्य स्थित हैं।
  • इसका उद्देष्य टोंक और सवांईमाधोपुर के सीमावर्ती गांवों में पीने का पानी उपलब्ध करवाना हैं।

मेजा बांध:-

  • भीलवाड़ा में कोठारी नदी पर स्थित हैं।
  • इस बांध से भीलवाड़ा शहर को पीने का पानी उपलब्ध होता हैं। (ग्रीन माऊण्ट पार्क)
  • यह कंकरीट का बना बांध हैं।

पाचना बांध:-

  • यह मिट्टी का बना बांध हैं। यह उच्च तकनीक का बांध हैं जो अमरीकी तकनीक से बना हैं। यह करौली में स्थित हैं।

जाखम बांध:-

  • माही की सहायक नदी जाखम पर प्रतापगढ़ में स्थित हैं।
  • इस बांध का निर्माण सन् 1962 में करवाया गया था।
  • इस बांध का उद्देष्य जनजाति क्षेत्र का आर्थिक विकास करना हैं।
  • सन् 1992 में इस बांध को जनजाति उपयोजना के अन्तर्गत शामिल किया गया था।
  • 4.5 मेगावाट की दो जल-विद्युत की इकाईयां स्थापित हैं। इस बांध से सर्वांधिक फायदा आदिवासी कृषकों को हुआ, विषेषकार उदयपुर व प्रतापगढ़ (चित्तौड़गढ़) के।

ओराई जल परियोजना (सिंचाई):-

  • चित्तौड़गढ़ में ओराई नदी (चम्बल की सहायक नदी) पर स्थित हैं।
  • इस बांध का उद्देष्य पहाड़ी क्षेत्र मंे मिट्टी के कटाव को रोकना हैं।

बांकली बांध:-

  • यह जालौर में, सुकड़ी व कुलथाना नदियों के संगम पर स्थित हैं।
  • इस बांध में जालौर, पाली व जोधपुर को पेयजल व सिंचाई उपलब्ध होती हैं।

पार्वती योजना:-

  • यह धौलपुर मंे पार्वती नदी पर स्थित हैं।
  • इस बांध का निर्माण सन् 1959 में किया गया था।
  • इस बांध से नहर निकाली गई हैं जिससे धौलपुर व भरतपुर को सिंचाई होती हैं।
  • पार्वती चम्बल की सहायक नदी हैं जो बांयी ओर से चम्बल मंे मिलती हैं।

सोम कागदर परियोजना:- यह उदयपुर मंे स्थापित परियेाजना हैं।

सोम-कमला अम्बा सिंचाई परियोजना:-

  • यह डूंगरपुर में स्थापित परियोजना हैं।
  • अड़वान बांध भीलवाड़ा में मानसी नदी पर
  • गंभीर बांध निम्बाहेड़ा (चित्तौड़गढ़) में गंभीरी नदी पर।
  • हरिषचन्द्र सागर बांध व भीम सागर बांध भीलवाड़ा में।
  • लासड़िया बांध अजमेर में खारी नदी पर।
  • डाईया बांध उदयपुर में गोमती नदी पर।
  • गोठरा बांध बूदी में।

कायलाना बांध जोधपुर में स्थित हैं। इसके द्वारा जोधपुर को पीने का पानी उपलब्ध करवाया जाता हैं।

 

नहरें

गंग नहर:-

  • इसका निर्माण सन् 1927 में किया गया था।
  • यह पंजाब में हुसैनीवाला नामक स्थान से सतलज नदी से निकाली गई हैं।
  • राजस्थान में इस नहर से सर्वांधिक सिंचाई गंगानगर को, हनुमानगढ़, रायसीनगर, पदमपुर, अनूपगढ़ तक इसकी सिंचाई फैली हुई हैं।
  • इस नहर से लगभग 1.5 लाख हैक्टेयर में सिंचाई होती हैं।
  • इस नहर के मरम्मत के लिए गंगनहर लिंक पैनल का निर्माण किया गया हैं।
  • सन् 1980-81 में हरियाणा सरकार की सहायता 80 किलोमीटर लिंक चैनल करवाया गया।

भरतपुर नहर:-

  • इसके निर्माण का पहला प्रयास सन् 1906 में किया गया था। लेकिन सफलता नहीं मिली।
  • सन् 1960 में निर्माण कार्य शुरू हुआ। 1963-64 में निर्माण पुरा हुआ।
  • यह नहर आगरा के पास यमुना से निकाली गई हैं।
  • इस नहर से भरतपुर के डीग व कामा में सिंचाई होती हैं।

गुडगांव नहर:-

  • यह हरियाणा और राजस्थान की संयुक्त परियोजना हैं।
  • इसका उद्गम हरियाणा के ओखला नामक स्थान से होता हैं।
  • इस नहर से भरतपुर के उत्तर मंे कामा पहाड़ी और जुरेरा में (जुरेरा) सिंचाई व पीने का पानी मिलता हैं।
  • इसका निर्माण कार्य सन् 1980 में हुआ था।

राजस्थान से बाहर स्थित परियोजनाएं (भागीदारी):-
सरदार सरोवर , कड़ाना बांध , दांतीवाड़ा बांध (पष्चिमी बनास)

भाखड़ा नागल परियोजना:-

  • हिमाचल प्रदेष में सतलज नदी पर स्थित हैं।
  • यह परियोजना राजस्थान, पंजाब व हरियाणा के मध्य की परियोजना हैं।
  • इस परियोजना से दिल्ली और हिमाचल प्रदेष को बिजली मिलती हैं।
  • राजस्थान की इस बांध से 15.22 % भागीदारी हैं।
  • राजस्थान को इस परियोजना से पानी इंदिरा गांधी नहर के माध्यम से मिलता हैं।
  • इसी परियोजना के अन्तर्गत रावी-व्यास का पानी भी राजस्थान को मिलता हैं।
  • व्यास नदी सतलज की सहायक हैं, जो हरि के बैराज नामक स्थान पर आकर सतलज में मिलती हैं।
  • रावी का पानी लिंक नहर द्वारा व्यास में गिराया जाता हैं। जिससे इसका अधिषेष पानी राजस्थान फीडर नहर को मिलता हैं।

सिद्धमुख नोहर परियोजना:-

  • यह एक नहर हैं जो सतलज नदी से निकाली गई हैं।
  • ठस नहर से हनुमानगढ़, चुरू, झुन्झनु और सीकर को पीने का पानी उपलब्ध होता हैं।
  • इसका षिलान्यास सन् 1986 में राजीवगांधी ने किया था।
  • इसमें पानी की शुरूआत सोनिया गांधी ने सन् 2002 में की।

 

विद्युत परियोजनाएँ

सौर ऊर्जा:-

  • राजस्थान का पष्चिमी क्षेत्र जैसलमेर, जोधपुर, बाड़मेर, सौलर एनर्जी के लिए सर्वांधिक उपयुक्त जिले हैं।
  • इसी उद्देष्य से राजस्थान सरकार ने इन तीनों जिलो को सीज क्षेत्र घोषित किया हैं।
  • सौलर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए विष्व बैंक व जर्मनी की सहायता से प्रोजेक्ट लगाए जा रहे हैं।
  • जोधपुर के मथानिया में 140 मेगावाट का सौर ऊर्जा केन्द्र स्थापित करने की योजना प्रस्तावित हैं।
  • जोधपुर के बालेसर में पहला सौर फ्रिज स्थापित किया गया था।
  • अंतरिक्ष में छोड़े गए उपग्रहों को सौलर बैटरी से ऊर्जा मिलती है। (राष्ट्रपति भवन को भी ऊर्जा)
  • उदयपुर के फतेहसागर झील में नावें और सौर वैध शाला सौलर ऊर्जा से संचालित हैं।
  • उदयपुर के डबोक हवाई अड्डे का अधिकांष भाग सौलर ऊर्जा से संचालित हैं।
  • दक्षिणी-पष्चिमी राजस्थान सौर ऊर्जा के लिए सबसे उपयुक्त क्षेत्र हैं।

पवन ऊर्जा:-

  • राजस्थान का पष्चिमी क्षेत्र पवन ऊर्जा के लिए सर्वांधिक उपयुक्त हैं। जहां
  • वर्षं के अधिकांष महीनों में 20 से 40 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से हवा चलती हैं।
  • इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र में (सीमावर्ती जिलें में) पवन ऊर्जा के लिए सर्वांधिक उपयुक्त हैं।
  • सामान्यतः पवन ऊर्जा के लिए वायु की गति 10-12 किलोमीटर प्रति घंटा होना आवष्यक हैं।
  • राजस्थान में जैसलमेर में अमरसागर, चित्तौड़गढ़ के देवगढ़ और जोधपुर के फलौदी में पवन ऊर्जा की तीन इकाईयाँ स्थापित की जा चुकी हैं।
  • 2006 तक राजस्थान में 450 मेगावाट की इकाईयां प्रस्तावित हो चुकी हैं।
  • राज्य के अक्षय ऊर्जा निगम के द्वारा जैसमेर के सोढ़ा गांव में 25 मेगावाट की एक इकाई स्थापित की जा रही हैं।

बायोगैस (गोबरगैस):-

  • गोबरगैस का अविष्कार बी.सी.देसाई ने किया।
  • गांवों में दीनदयाल माॅडल सर्वांधिक प्रचलित हैं।
  • सन् 1981 में (छठी पंचवर्षीय योजना) यह कार्यक्रम (बायोगैस) शुरू किया गया।
  • इसमें गीला गोबर का उपयोग किया जाता हैं।

बायोमास:-

  • इसमें पेड़-पौधों की पत्तियां व घास-फूस काम मंे ली जाती हैं।
  • गंगानगर में सर्वांधिक प्रसिद्ध हैं।

लिग्नाईट आधारित विद्युत परियोजनाएँ:-

  • राजस्थान अच्छे किस्म के लिग्नाईट उत्पादन में प्रथम स्थान पर हैं।
  • लिग्नाइट के भण्डारण की दृष्टि में दूसरे स्थान पर हैं, पहला स्थान तमिलनाडु का एवं तीसरा स्थान गुजरात का हैं।
  • इसके उत्पादक जिलें निम्न हैं:-  बाड़मेर , बीकानेर , नागौर
  • सबसे अच्छे किस्म का लिग्नाई पलाना में उत्पादित होता हैं।
  • कपुरड़ी (बाड़मेर):- लिग्नाइट उत्पादक क्षेत्र जहां 250 मेगावाट की इकाईयां स्थापित की जा रही हैं।
  • जालिप्पा (बाड़मेर):-यहां 250-250 मेगावाट की 4 इकाईयां निर्माणाधीन हैं।
  • गिरल (बाड़मेर):- 250 मेगावाट की एक इकाई स्थापित हैं।

सूरतगढ़ थर्मल पावर प्रोजेक्ट:-

  • थर्मल पावर प्राजेक्ट को NTPC द्वारा संचालित किया जाता हैं। (नेषनल थर्मल पावर कारपोरेषन)
  • सूरतगढ़ में कुल 6 इकाईयाँ स्थापित हैं।
  • सबसे कम 195 मेगावाट की हैं जिसका जनवरी 2007 में षिलान्यास हुआ था।
  • कुल स्थापित क्षमता 1440 मेगावाट हैं।

धौलपुर थर्मल पावर प्रोजेक्ट (गैस पर आधारित) (नेफ्था):- यह निर्माणाधीन हैं।

कोटा थर्मलपावर प्रोजेक्ट:-

  • यह सन् 1978 में स्थापित किया गया था।
  • यह राजस्थान का पहला सबसे बड़ा थर्मल पाॅवर प्रोजेक्ट था।
  • इसके अन्तर्गत कुल चार चरणों का निर्माण हुआ। जिसमें 6 इकईयां स्थापित की जा चुकी हैं।
  • इनकी कुल स्थापित क्षमता 1240 मेगावाट हैं।
  • छठी इकाई 195 मेगावाट की हैं।
  • सातवीं इकाई का षिलान्यास सन् 2006 में किया गया जिसमें उत्पादन 2008 के अंत मंे शुरू होगा।

राजस्थान से बाहर स्थित विद्युत परियोजनाएं, जिसमें राजस्थान की भागीदारी हैं:-

धौलीगंगा जल-विद्युत परियोजना:-

  • उत्तरांचल में धौलीगंगा नदी पर स्थित हैं।
  • जिससे राजस्थान को 75 मेगावाट बिजली मिलती हैं।

सिंगरौली सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट:-

  • उत्तर-प्रदेष में स्थित।
  • इसकी स्थापित क्षमता 2050 मेगावाट हैं।
  • राजस्थान को 15 % अर्थात् 307.5 मेगावाट मिलती हैं।

नरौरा परमाणु ऊर्जा केन्द्र:-

  • यह उत्तरप्रदेष में स्थित हैं।
  • इससे राजस्थान को 9.6% बिजली मिलती हैं।

सतपुड़ा ताप विद्युत परियोजना:-

  • राजस्थान, मध्यप्रदेष व गुजरात की संयुक्त परियोजना हैं।
  • इसमंे राजस्थान को 1/3 भाग मिलेगा।
  • वर्तमान में 100 मेगावाट मिल रही हैं, कुल 100 मेगावाट का उत्पादन होता हैं।

रिहन्द सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट:-

  • यह उत्तरप्रदेष में स्थित हैं।
  • राजस्थान को कुल उत्पादन का 9.5% प्राप्त होता हैं।
  • इसकी स्थापित क्षमता 1000 मेगावाट हैं।

औरभा ताप विद्युत परियोजना:-

  • यह उत्तरप्रदेष में स्थित हैं।
  • इससे राजस्थान को कुल 9.2 % बिजली प्राप्त होती हैं।
  • इसकी कुल क्षमता 952 मेगावाट हैं।

अंता ताप विद्युत परियोजना:-

  • यह बांरा में स्थित गैस आधारित परियोजना हैं।
  • इससे राजस्थान को कुल 19.8 % बिजली मिलेगी।
  • यह केन्द्र सरकार व राज्य सरकार की सम्मिलित परियोजना हैं।
  • इसकी कुल क्षमता 413 मेगावाट हैं।

भाखड़ा-नागंल परियोजना:-

  • इसके अंतर्गत 2 इकाईयां स्थापित हैं। पहली सुरगंगुवाल में व दूसरी कोटला में हैं।
  • इन दोनो इकाईयों से राजस्थान को 15.2 % बिजली मिलती हैं।
  • पोंग जल विद्युत परियोजना से 58 % बिजली राजस्थान को मिलती हैं।
  • देहर (हिमाचल प्रदेष) विद्युत परियोजना से 20% राजस्थान को मिलती हैं।

चम्बल नदी घाटी परियोजना से 50 % बिजली मिलती हैं। जो राजस्थान व मध्यप्रदेष के मध्य विभाजित होती हैं।
माही जल विद्युत परियोजना से 140 मेगावाट बिजली मिलती हैं। (जमनालाल बजाज सागर बांध)
इंदिरा गांधी नहर पर पूगल, सूरतगढ़, चारणवाली, अनुपगढ़ व बीसलपुर शाखाओं पर छोटी-छोटी जल विद्युत परियोजना स्थापित की गई हैं। (22 मेगावाट)

राहु घाट जल-विद्युत परियोजना हैं:-

  • यह करौली में चम्बल नदी पर निर्माणाधीन हैं।
  • यह 79 मेगावाट की विद्युत परियोजना हैं।

अनास जल-विद्युत परियोजना:- यह उदयपुर में स्थापित 45 मेगावाट की परियोजना हैं।

राजस्थान में सर्वांधिक विद्युत का उत्पादन थर्मल पाॅवर से होता है।
दूसरा स्थान जल-विद्युत का हैं।
तीसरा स्थान परमाणु ऊर्जा का हैं।

राजस्थान विद्युत मण्डल को 1999 में 3 भागों में बांटा गया हैं।
1. उत्पादन (जयपुर) 2. प्रसारण (जयपुर) 3. वितरण (जयपुर, जोधपुर, अजमेर)

  • 2006 के दिसम्बर तक राजस्थान के 98% गांव विद्युतीकृत थें।
    सूरतगढ़ में ताप विद्युत की पहली इकाई में उत्पादन कार्य सन् 1998 में शुरू हुआ था।
    कोटा में उत्पादन कार्य सन् 1982 में शुरू हुआ था।
    पहला स्थान:- सूरतगढ़ का, दूसरा स्थान:- कोटा का, तीसरा स्थान:- छबड़ा (बांरा) का हैं।
    मार्च, 2007 तक राजस्थान की कुल स्थापित विद्युत क्षमता 5647 मेगावाट थी।

Rajasthan Energy Development Agency (REDA) (रेड़ा) :-

  • इसकी स्थापना सन् 1985 में की गई थी।
  • इसका उद्देष्य गैर-परम्परागत ऊर्जा स्त्रोतों का विकास करना था।
  • सौर-ऊर्जा, बायोगैस, पवन-ऊर्जा, बायोमास, लकड़ी गैर-परम्परागत ऊर्जा के स्त्रोत हैं।
  • वर्तमान मंे इसका अस्तित्व समाप्त हो गया हैं, क्योंकि 2002 में इसका विलय RREC (Rajasthan Renewable Energy Corporation) में कर दिया गया हैं।
  • छबड़ की स्थापित विद्युत क्षमता 250 मेगावाट की एक, 300 मेगावाट की एक, 500 मेगावाट की एक इकाई हैं। तीनों निर्माणाधीन हैं।
  • राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम द्वारा 6000 करोड़ लागत की 1552 मेगावाट की विभिन्न इकाईयाँ स्थापित करने की योजना 2007 में बनाई थी।
  • ये इकाईयाँ गिरल, धौलपुर, छबड़ा, कोटा में स्थापित की जाएगी।

कुटीर ज्योति योजना:-

  • यह सन 1998-99 में शुरू की गई।
  • इसमें BPL परिवारों को विद्युत कनेक्षन (1 बल्ब का) मुफ्त में देने की योजना हैं।
  • बायोगैस संयंत्र लगाने का कार्य खादीग्रामोद्योग विभाग द्वारा किया जाता हैं।
  • जिसके लिए 60 % अनुदान मिलता हैं।
  • इसके लिए पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया था।
  • जब उत्तरी ग्रिड (जाल) फेल हो जाते हैं जो उसके स्टार्टअप के लिए बिजली राणाप्रताप सागर बांध विद्युत इकाई से मिलती हैं। इसकी स्थापित क्षमता 115 मेगावाट हैं।
  • 2006 के अंत तक पवन ऊर्जा से 280 मेगावाट विद्युत उत्पादन होता था तथा बायोगैस से 38 मेगावाट उत्पादन होता था।

 

पंचवर्षीय योजना तथा औद्योगिक विकास

पहली पंचवर्षींय योजना (1 अप्रैल 1951 से 31 मार्च 1956):-

  • इस योजना का प्रारूप हेरोल्ड नामक अर्थषास्त्री ने तैयार किया। इसलिए इसे हेराॅल्ड माॅडल भी कहा जाता हैं।
  • पहली पंचवर्षींय योजना से लेकर 7 वीं योजना तक सिंचाई, कृषि व विद्युत पर सर्वांधिक बल दिया गया।
  • सन् 1953 में राजस्थान में ग्रामीण स्तर पर पंचायती राज अधिनियम लागू किया गया।
  • चम्बल नदी घाटी परियोजना का निर्माण कार्य शुरू हुआ।
  • राजस्थान वित्त निगम की स्थापना सन् 1955 में की गई।
  • इस योजना के दौरान खाद्य उत्पादन पर सर्वांधिक बल दिया गया।
  • भाखड़ा-नांगल परियोजना शुरू हुई।

दूसरी पंचवर्षींय योजना (सन् 1956-1961):-

  • इस काल में पंचायती राज अधिनियम लागू हुआ।
  • राजस्थान खादी ग्रामोद्योग मंडल की स्थापना हुई।
  • राजस्थान हाथकरद्या मण्डल की स्थापना हुई।
  • राजस्थान लघु उद्योग निगम की स्थापना हुई।
  • राजस्थान वित्त निगम ;त्थ्ब्द्ध ने अपना कार्य शुरू किया।
  • जमींदारी व जागीरदारी प्रथा का उन्मूलन किया।
  • इस योजना की रूपरेखा महालनोविस ने बनायी थी।
  • CSO (केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन) के निदेषक थें
  • CSO (केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन) भारत के आर्थिंक विकास से संबंधित आंकड़े तैयार करता हैं।

तीसरी पंचवर्षींय योजना (सन् 1961-66):-

  • इस काल में दो युद्ध हुए पहला 1962 में चीन से दूसरा 1965 मंे पाकिस्तान से।
  • पाकिस्तान ने गुजरात के कच्छ क्षेत्र पर आक्रमण किया व चीन ने अरूणाचल प्रदेष पर आक्रमण कया।
  • सन् 1965 में BSF का गठन हुआ।
  • इस योजना में पहली बार उद्योगों के विकास को प्राथमिकता दी गई।
  • सघन कृषि कार्यक्रम शुरू किया गया (उन्नत बीज), जिसके परिणामस्वरूप हरित क्रांति हुई।

हरित क्रांति:-

  • भारत में हरित क्रांति सन् 1966-67 में शुरू हुई थी।
  • भारत में हरित क्रांति के जन्मदाता एम.एस.स्वामीनाथन थें। जो वर्तमान में किसान आयोग के अध्यक्ष थें।
  • किसान आयोग का गठन पहली बार 2004 में हुआ था।
  • वैष्विक स्तर पर हरित क्रांति की शुरूआत मैक्सिकों में सन् 1954 में हुई थी। इसके जनक नारमान बारलोग थे।
  • वर्गीज श्वेत क्रांति के जनक (आपरेषन फ्लड़)
  • हरित क्रांति का अर्थ/उद्देष्य:- संकर किस्म के बीजों का उपयोग करना, रासायनिक खाद का अत्यधिक उपयोग और कृषि का मषीनीकरण करना।
  • गेहूँ, मक्का, सरसों, दालें (हरित क्रांति में)
  • सर्वांधिक प्रभाव पंजाब, हरियाणा, पष्चिमी उत्तर-प्रदेष, मध्यप्रदेष, पूर्वी राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र में हुआ।

तीन एकवर्षींय योजनाएँ (1966-69):- एक वर्षीय योजना का मुख्य कारण विनाषक युद्ध था।

चैथी पंचवर्षींय योजना (1969-74):-

  • इस काल में भारत-पाकिस्तान युद्ध सन् 1971 में हुआ था।
  • डेयरी विकास कार्यक्रम शुरू हुआ।
  • सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम शुरू हुआ।
  • कमाण्ड क्षेत्र विकास कार्यक्रम (सिंचित क्षेत्र का विकास) शुरू हुआ।
  • इस योजना की रूपरेखा अषोक मेहता ने बनायी।
  • RIICO की स्थापना की गई।

पांचवी पंचवर्षींय योजना (1974-79):-

  • यह योजना एकवर्ष पहले ही समाप्त कर दी गयी थी।
  • इस योजना में पहली बार विकेन्द्रिकृत नियोजन को प्राथमिकता दी गई। (स्थानीय स्तर पर)
  • जिला उद्योग केन्द्रों की स्थापना की गई।
  • आत्मनिरर्भरता व गरीबी उन्मूलन को मुख्य उद्देष्य रखा गया।
  • न्यूनतम आवष्यकता कार्यक्रम शुरू किया गया।
  • बीस (20) सूत्रीय कार्यक्रम शुरू किया गया।
  • यह योजना मार्च 1978 में समाप्त की गई।
  • क्योंकि केन्द्र में पहली बार गैर कांगे्रसी सरकार बनी। जनता पार्टी की सरकार बनी थी।

 

नोट :-

  • जनता पार्टी ने 5 वीं योजना को समाप्त कर 78-83 के बीच छठी पंचवर्षींय योजना शुरू की जिसे अनवरत योजना (Rolling Plan) कहते हैं।
  • लेकिन कांग्रेस के सत्ता में आते ही इस योजना को समाप्त कर दिया गया।
  • नई योजना की रूपरेखा बनाई गई। यह 1980-85 तक चली जिसे छठी योजना कहते हैं।

छठी पंचवर्षींय योजना:-

  • इस योजना में बीस सूत्री कार्यक्रम पर बल दिया गया।
  • एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम चलाया गया।
  • राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम को लक्ष्य बनाया गया।

सातवी योजना (1985-90):-

  • इस अवधि में रोटी, कपड़ा और मकान सर्वसाधारण को सुलभ कराने की योजना बनाई गई तथा निर्धनता उन्मूलन का लक्ष्य निर्धारित किया गया।
  • मरू विकास कार्यक्रम शुरू किया गया।

एक-एक वर्षं की दो योजनाएं (1990-92):-

  • इसके अंतर्गत उदारीकरण पर बल दिया गया।
  • उदारीकरण की नीति मनमोहन सिंह ने बनाई थी।

आठवी योजना (1992-97):-

  • इस योजना में पहली बार ऊर्जा पर सर्वांधिक ध्यान दिया गया।
  • जिला नियोजन की शुरूआत की गई।
  • जापान के सहयोग से अरावली क्षेत्र मंे अरावली वानिकी विकास परियोजना चलाई गई।
  • जीवन धारा योजना शुरू की गई।
  • सीमांत कृषकों (छोटे खेत वाले) के लिए कुओं के निर्माण हेतु धन दिया गयां
  • लोक जुम्बिष परियोजना व षिक्षाकर्मी परियोजना स्वीड़न की सहायता से शुरू की गई।
  • ये दोनो सर्वषिक्षा अभियान के अंग हैं। जो 2009 में बंद हो गई हैं।
  • सर्वषिक्षा अभियान के स्थान पर भारत सरकार द्वारा सकसेस योजना शुरू की जाएगी।
  • इस योजनाकाल में दौसा जिलें में परिवार नियोजन के लिए विकल्प योजना शुरू की गई, जिसे बाद में बंद किया गया।

 

नवीं पंचवर्षींय योजना (1997-2002):-

  • सामुदायिक सेवाओं व ऊर्जां पर सर्वांधिक खर्च किया गया।
  • न्यायपूर्ण वितरण व समानता के साथ विकास पर बल दिया गया।

दसवी पंचवर्षींय योजना (2002-2007):-

  • इस काल में गरीबी हटाने पर सर्वांधिक बल दिया गया।
  • गरीबी रेखा कों 2012 तक 15% तक कम करने का लक्ष्य निर्धांरित किया गया।
  • 2007 तक 5% व 2012 तक 15% गरीबी कम करने का लक्ष्य रखा गया।

ग्याहरवी पंचवर्षींय योजना (2007-2012):-

  • सामुदायिक सेवाओं पर सर्वांधिक ध्यान दिया जाएगा।
  • ऊर्जा उत्पादन की दृष्टि से पूर्ण आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया।

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य:-

  • गरीबी हटाओं का नारा पंचायती योजना में दिया गया
  • पंचवर्षींय योजनाओं की रूपरेखा योजना आयोग बनाता हैं व राष्ट्रीय विकास परिषद् लागू करती हैं।
  • योजना आयोग गैर-संवैधानिक/सलाहकारी संस्थाा हैं (संविधानेतर भी)।
  • पंचवर्षींय योजना की अवधारणा रूस से ली गई हैं।
  • नौंवी पंचवर्षींय योजना में षिक्षा आपके द्वार कार्यक्रम शुरू किया गया।
  • सातवीं योजना में योजना, काम और उत्पादकता पर बल दिया गया।

 

क्षेत्रीय विकास कार्यक्रम

सुखा संभावित क्षेत्र विकास कार्यक्रम:-

  • यह सन् 1974-75 में शुरू किया गया।
  • इसमें केन्द्र व राज्य सरकार की 50: 50 की भागीदारी हैं।
  • इस योजना का मुख्य उद्देष्य सूखे की सम्भावना वाले क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था में सुधार करना हैं।
  • मिट्टी व जल का संरक्षण करना हैं।
  • जल संसाधनों का विकास करना हैं।
  • वृक्षारोपण पर बल देना हैं।
  • यह योजना वर्तमान में चल रही हैं।
  • 11 जिलों में संचालित हैं:-

1. अजमेर 2. कोटा 3. बांरा 4. टोंक
4. झालावाड़ 5. उदयपुर 6. डुंगरपुर 7. बांसवाड़ा
8.सवांईमाधोपुर 9. भरतपुर 10. करौली।
इस योजना में जलग्रहण क्षेत्र के सर्वांधिक विकास करने पर सर्वांधिक बल दिया गया, जो ग्रामीण स्तर पर शुरू की गई थी।

मरू विकास कार्यक्रम (1977-78):-

  • सन् 1985-86 तक इसका खर्च केन्द्र व राज्य के बीच विभाजित किया गया था।
  • इसके बाद सन् 1986 में इसका खर्च केन्द्र सरकार वहन करने लगी।
  • यह योजना 16 जिलों में संचालित हैं, जो सभी पष्चिमी राजस्थान व दक्षिणी राजस्थान के हैं।
  • उदयपुर, सिरोही, राजसमंद, पाली, बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर, नागौर,
  • चुरू, झुन्झनु, सीकर, बीकानेर, अजमेर, जयपुर, गंगानगर और जालौर में यह योजना संचालित हैं।
  • यह योजना राष्ट्रीय कृषि आयोग की सिफारिष पर शुरू की गई थी।
  • इस योजना का कार्य निम्न हैं:-
  • पशुपालन, भेड़पालन, सामाजिक वानिकी (सार्वजनिक), कृषि वानिकी।
  • लघु सिंचाई योजनाओं का विकास करना।
  • ग्रामीण विद्युतीकरण पर बल।
  • मरूस्थलीकरण को रोकना।

जनजाति क्षेत्र विकास कार्यक्रम (1992-93):-

  • इसकी शुरूआत सन् 1992-93 में जो 1974-75 की जनजाति उपयोजना का दूसरा रूप हैं।
  • इसका उद्देष्य जनजाति क्षेत्र का विकास करना हैं। जो राजस्थान की कुल जनसंख्या का 12.6 % (अनुसूचित जनजाति) हैं।
  • यह योजना उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, सिरोही व चित्तौड़गढ़ में चलाई गई।

सहरिया विकास कार्यक्रम:-

  • सन् 1977-78 में केन्द्र सरकार द्वारा राजस्थान के लिए सहरिया क्षेत्र के लिए यह कार्यक्रम शुरू किया गया।
  • बांरा के शाहबाद व किषनगंज में सहरियों की जनसंख्या सर्वांधिक हैं।
  • कृषि, पशुपालन, सिंचाई, वानिकी, षिक्षा, पोषण, कुटीर उद्योग को बढ़ावा देना व उनको शोषण से बचाना।
  • सहरियों का कंुभ सीताबाड़ी बांरा में भरता हैं।

परिवर्तित क्षेत्र विकास दृष्टिकोण (माड़ा) :-

  • यह योजना सन् 1978-79 में शुरू की गई।
  • यह योजना आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रो तथा बिखरी हुई जनजातियों के लिए हैं, जो संबंधित जिले में बिखरी हुई हैं।
  • अलवर, धौलपुर, सवांईमाधोपुर, कोटा, बूंदी, झालावाड़, टोंक, जयपुर, सिरोही, पाली, उदयपुर, चित्तौड़गढ़ में संचालित की जा रहीं हैं।
  • इस योजना के अन्तर्गत शैक्षणिक विकास पर सर्वांधिक ध्यान दिया गया हैं।
  • बिखरी जनजातियों के लिए विकास कार्यक्रम सन् 1979 में शुरू किया गया।
  • इस कार्यक्रम का संचालन जनजाति क्षेत्र विकास विभाग के द्वारा किया जाता हैं।
  • इसके अन्तर्गत लड़कियों के लिए छात्रावास, निःषुल्क षिक्षा, छात्रवृत्ति, परीक्षा-पूर्व प्रषिक्षण संस्थान संचालित किये जाते हैं।

जनजाति अनुसंधान संस्थान:-

  • यह उदयपुर में हैं, जो केन्द्र व राज्य के 50: 50 की भागीदारी से संचालित हैं।

रूख-भायला कार्यक्रम (वृक्ष-मित्र कार्यक्रम):-

  • यह सन् 1986 में राजीव गांधी के द्वारा डुंगरपुर जिले मंे शुरू किया गया।
  • सन् 2001 में गांधी ग्राम योजना शुरू की गई।
  • गंगानगर जिले को छोड़कर राज्य की सभी पंचायत समितियों में आदर्ष ग्राम गांधी ग्राम का चयन किया जायेगा।
  • इस योजना का मुख्य उद्देष्य पंचायत स्तर पर जल-ग्रहण क्षेत्र का विकास करना हैं।

पुष्कर गैप परियोजना:-

  • यह कनाड़ा की सहायता से पुष्कर झील को स्वच्छ सुन्दर बनाने के लिए चालाई गई योजना हैं। जो सन् 1997-98 में शुरू की गई थी।

मेवात क्षेत्र विकास कार्यक्रम:-

  • यह अलवर, भरतपुर क्षेत्र में सामाजिक-आर्थिंक विकास के लिए सन्1987-88 में संचालित योजना हैं।

डांग क्षेत्रीय विकास कार्यक्रम:-

  • कंकरीला, पथरीला, अनुउपजाऊ क्षेत्र डांग कहलाता हैं।
  • रेबारी जाति अकाल के समय ‘डांग’ जाते हैं।
  • सन् 1994-95 मे सवांईमाधोपुर, धौलपुर, करौली, बूंदी, कोटा, बांरा, झालावाड, भरतपुर आदि आठ जिलो में यह कार्यक्रम संचालित हैं।
  • उद्देष्य:- इस क्षेत्र का आर्थिंक-सामाजिक विकास करना, डाकुओं से मुक्ति दिलाना व पर्यावरण का विकास करना हैं।
  • कंदरा प्रभावित क्षेत्र हैं।

मगरा क्षेत्र विकास कार्यक्रम (2005 – 06):-

  • अरावली का केन्द्रीय मध्य भाग मगरा क्षेत्र कहलाता हैं।
  • इसके अन्तर्गत पाली, राजसमंद, अजमेर का दक्षिण भाग, चित्तौड़गढ़, सिरोही आदि जिले आते हैं।
  • इस योजना का उद्देष्य आर्थिंक, सामाजिक विकास करना हैं।

सहकारी आन्दोलन:-

  • सहकारिता विषय राज्य सूची का हैं।
  • सहकारिता का उदय जर्मनी में हुआ हैं।
  • राज्य स्तर पर विधानसभा (विधानमण्डल) में राज्यपाल के द्वारा सहकारिता का ज्ञान रखने वाले कुछ व्यक्तियों का मनोनयन किया जाता हैं।
  • विधानपरिषद् के 1ध्6 सदस्यों को राज्यपाल मनोनीत करता हैं। (राजस्थान में 66 सदस्य होगें)
  • साहित्य, कला, विज्ञान, समाजसेवा व सहकारिता का ज्ञान रखते हैं।
  • सहकारिता का मूल सिद्धांत ‘एक सबके लिए सब एक के लिए’।
  • सहकारिता के ध्वज का रंग सतरंगी (इंद्रधनुषी) होता हैं।
  • सन् 1904 में पहली बार भारत सरकार ने सहकारी समिति अधिनियम बनाया।
  • जिसके अनुसार कम से कम 10 व्यक्तियों के द्वारा सहकारी समिति गठित की जा सकती हैं।
  • राजस्थान में सहकारिता आंदोलन की शुरूआत सर्वप्रथम अजमेर से सन् 1904 में हुई तथा 1905 में अजमेर में प्रथम सहकारी समिति गठित की गई।
  • राज्य स्तर पर पहला सहकारी कृषि बैंक भरतपुर (डीग) में सन् 1904 में स्थापित हुआ।
  • व्यापक स्तर पर भरतपुर में 1915, कोटा में 1916, बीकानेर मंे 1920, अलवर में 1935, जयपुर व जोधपुर में 1943 में सहकारिता से संबंधित कानून बनाए गए।
  • सहकारिता संबंधित पहला अधिनियम भरतपुर में लागू किया गया।
  • सम्पूर्ण राजस्थान के लिए पहला सहकारिता अधिनियम सन् 1953 में लागू किया गया। जिसमें सन् 1965 में संषोधन हुआ। यह 2001 तक लागू रहा।
  • 2001 में नया सहकारिता अधिनियम बनाया गया जो 13 नवम्बर, 2002 को लागू हुआ।

राज्य स्तर पर सहकारी संस्थाओं का वर्गीकरण

राज्य सहकारी बैंक:-

  • यह सहकारिता की सर्वोच्च संस्थ हैं, जो केन्द्रीय सहकारी बैंक व रिर्जव बैंक के बीच बड़ी के रूप में कार्य करता हैं।

केन्द्रीय सहकारी बैंक:-

  • यह राज्य सहकारी समितियों/बैंक व सहकारी समितियों के बीच कड़ी के रूप में कार्य करती हैं।

सहकारी समितियां:-

  • ये पंचायत स्तर पर होती हैं।
  • ये दो भागों में विभाजित हैं।
  • ग्रामीण प्राथमिक सहकारी समितियां।
  • शहरी प्राथमिक सहकारी समितियां।
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