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Lakshya Competition Academy
PVT. Limited

Upendra Singh Rajpurohit
जस्सूसर गेट के बाहर,
करणी माता मंदिर के पास,
लक्ष्य कैम्पस,
बीकानेर
Mobile- 9571563399
Rajpurohitsinghup@gmail.com

>    प्रस्तावना:-
यह अनुच्छेद संसद/सरकार को असामान्य परिस्थितियों का सामना करने के लिये सक्षम बनाती है इस प्रावधान को प्रभावी बनाने का उदेश्य देश की एकता, अखण्डता, संप्रभुता, लोकतंत्र, राजनैतिक व्यवस्था और संविधान की सुरक्षा करना है। इस स्थिति मे केन्द्र सरकार शक्तिशाली हो जाती है और संविधान में संशोधन किये बिना ही संघात्मक ढांचा एकात्मक में बदल जाता है।

>    संविधान में आपातकालीन स्थिति के लिये 3 प्रकार है।

-    अनुच्छेद (352) युद्ध/बाहरी आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह के कारण आपातकाल को राष्ट्रीय आपात नाम दिया जाता है। लेकिन संविधान में इसे ‘‘आपातकाल की घोषणा’’ नाम दिया गया है।

-    अनुच्छेद (356) राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता के कारण आपातकाल को राष्ट्रपति शासन के नाम से जाना जाता है इसे राज्य आपातकाल /संवैधानिक आपातकाल नाम से जाना जाता है। लेकिन संविधान में इस प्रावधान के लिये ‘‘आपातकाल‘‘ शब्द का प्रयोग नहीं है।

-    अनुच्छेद (360) जब देश की वितीय स्थिति बिगड़ जाये तो ऐसी स्थिति में वितीय आपात का प्रावधान है इसे वितीय आपातकाल कहा जाता है।

राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद-352)

>   यदि भारत की या भारत के किसी भाग की सुरक्षा को युद्ध या बाह्य आक्रमण सशस्त्र विद्रोह के कारण खतरा उत्पन्न हो जाये या ऐसी संभावना होने पर भी राष्ट्रपति आपात की घोषणा कर सकता है।

>    ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति विभिन्न उद्घोषणा जारी कर सकता है। चाहे ऐसी उद्घोषणा कहले से लागू हो उन्हें दुबारा घोषित कर सकता है। यह प्रावधान 1975 में 38 वें संविधान संशोधन द्वारा किया गया ।
1.    जब बाहरी आक्रमण के आधार पर आपातकाल की अद्घोषणा की जाये तो उसे बाह्य आपात कहते है।
2.    जब सशस्त्र विद्रोह के कारण आपात की घोषणा हो तो उसे आंतरिक आपात कहते है।

>    1976 में 42 वें संविधान संशोधन द्वारा राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि वह भारत के किसी भी भाग में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर सकता है।

>    आंतरिक गड़बडी:-
आंतरिक अशांति के लिये संविधान में आंतरिक गड़गड़ी शब्द का प्रयोग किया गया और इस आधार पर सन् 1975 में इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय आयात की घोषणा करवाई थी। लेकिन राष्ट्रीय आपात की घोषणा केवल मंत्रिमण्डल की लिखित सिफारिश पर होगी। प्रधानमंत्री की सलाहमात्र से नहीं होगी।

>    1978 में 44वें संविधान संशोधन द्वारा अंातरिक गड़बड़ी के स्थान पर सशस्त्र विद्रोह शब्द का प्रयोग किया गया। इस संशोधन के द्वारा आपातकाल को घोषणा को न्यायिक समीक्षा की परिधि में लाया गया।

>    राष्ट्रीय आपात को अनुयोदन व समयावधि:-
1.    संसद के दोनों सदनों द्वारा आपातकाल की उद्घोषणा जारी होने के एक माह के भीतर आपातकाल का अनुमोदन होन आवशयक है।

2.    44 वें संविधान संशोधन से पहले यह अवधि 2 माह थी, इस संशोधन के द्वारा घटाकर एक माह कर दी गई। लेकिन यदि आपातकाल की घोषणा ऐसे समय हो जब लोकसभा का विघटन हो गया हो तब उद्घोषणा लोकसभा के पुर्नगठन के बाद पहली बैठक से 30 दिनों तक  जारी रहेगी। ऐसा होगा राज्य सभा ने इसका अनुमोदन कर दिया हो।

3.    यदि संसद के दोनों सदनों ने इसका अनुमोदन कर दिया तो आपातकाल छः माह तक जारी रहेगा। और प्रत्येक छः माह के बाद संसद उसे अनुमोदित करेगी। और यह अनन्तकाल तक बढ़ाया जा सकता है।

4.    अगर लोकसभा का विघटन छः माह की अवधि में आपातकाल के समय हो गया और आगे अनुमोदन करना है तो अवधि में राज्यसभा अनुमोदन करेगी और वह उद्घोषणा लोसभा की पहली बैठक से 30 दिनों तक रहेगी।

5.    जारी रखने के लिये बहुमत:- दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित होना चाहिये।
1.    कुल सदस्यों का बहुमत उस सदनों में कुल सदस्यों का बहुमत।
2.    उस सदन में उपस्थित व मतदान में भाग लेने वालों का 2/3 बहुमत।

   राष्ट्रीय आपात की समाप्ति:-

 शर्त 1:- आपातकाल की उद्घोषणा राष्ट्रीय द्वारा किसी भी समय समाप्त की जा सकती है इसके लिये संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होगी।

 शर्त 2:- राष्ट्रपति को ऐसी उद्घोषणा को समाप्त कर देना चाहिये जब लोकसभा इसे जारी रखने के प्रस्ताव को निरस्त कर दे।

 शर्त 3:- (1978 मैं 44 वें संविधान द्वारा) यदि लोकसभा के कुल सदस्यों के 1/10 सदस्य लोकसभा अध्यक्ष को लिखित में नोटिस दे तो 14 दिन के अंदर इस उद्घोषणा को समाप्त करने के लिये बैठक बुलाई जायेगी। इस उद्घोषणा को अस्वीकार करने का प्रस्ताव दो तरह से जारी होगा -
1.    पहला प्रस्ताव:- लोकसभा में पारित होना आवश्यक है जबकि दूसरे को संसद के दोनों सदनो में
2.    पहले को केवल साधारण बहुमत से स्वीकार किया जाये दूसरे को विशेष बहुमत से।

>    राष्ट्रीय आपात का प्रभाव:-
1.    केन्द्र राज्यों के संबधो में परिवर्तन हो जाता है।

2.    केन्द्रीय शक्ति/केन्द्रीय कार्यपालिका शक्ति का विस्तार राज्य कार्यपालिका तक हो जाता है।

3.    राज्य पूर्ण रूप से केन्द्र के अधीन हो जाता है राष्ट्रीय आपात के दौरान राज्य सरकारें निलंबित नहीं होती निष्प्रभावी हो जाती है।

4.    राज्य की सारी विधायी शक्तियाँ संसद के पास चली जायेगी राज्य सूची पर कानून बनाने का अधिकार संसद के पास चला जायेगा। और राज्य के संबध में बनाये छः माह तक लागू रहेगें। आपातकाल की समाप्ति के बाद और यदि विधानसभा चाहे तो इस कानून को आगे छः माह के बाद भी जारी रख सकता है।

5.    वितीय शक्तियों पर केन्द्र का पूर्ण नियंत्रण:- केन्द्र चाहे तो राज्य की वितीय सहायता में कमी कर सकता है।

6.    लोकसभा या राज्य विधानसभा के कार्यकाल पर प्रभाव:-
1.    लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। जिसे 1 वर्ष के लिये कितने ही समय तक बढ़ाया जा सकता है।
2.    आपात की समाप्ति के बाद छः माह से ज्यादा नहीं बढाया जायेगा। 1971 से 1977 के दौरान यह कार्यकाल दो बार बढाया गया ।

  मौलिक अधिकारों पर प्रभाव:- अनुच्छेद 368 व 353 राष्ट्रीय आपात में मौलिक
अधिकारों के प्रभाव का वर्णन करते है।

>    अनुच्छेद 358:-
अनुच्छेद 19 में वर्णित मौलिक अधिकारों के निलंबन से संबधित है जब राष्ट्रीय आपात की घोषणा की जाती है तब अनु. 19 में प्रति 6 मूल अधिकार स्वतः ही निलंबित हो जाते है इसके निलंबन के लिये आदेश की आवश्यकता नहीं पड़ती । राष्ट्रीय आपात के दौरान राज्य अनु. 19 द्वारा प्राप्त मौलिक अधिकारों को कम करने या हटाने के लिये कानून बना सकता है ऐसे किसी कानून को चुनौति नहीं दी जा सकती। आपातकाल समाप्त होने पर 19 में वर्णित मूल अधिकार स्वतः जीवित हो जायेगें।

>    अनुच्छेद 359 (अन्य मौलिक अधिकारों का निलंबन अनुच्छेद 20, 21 को छोड़कर):
यह अनुच्छेद आपातकाल के दोरान, मौलिक अधिकारों को लागू करने हेतु न्यायालय में जाने के अधिकार के निलंबन से संबधित ।

>    भारत मे आपातकाल कब-कब लागू हुआ:-

1.    राष्ट्रीय आपात:-
अक्टूबर 1962  को लागू हुआ जब चीन के द्वारा जेफा पर अधिकार कर लिया गया यह जनवरी 1968 तक रहा इसी दौरान 1965 में पाकिस्तान से युद्ध हुआ अतः आपातकाल की घोषणा की आवश्यकता नही पड़ी।

2.    राष्ट्रीय आपात:-
दिसम्बर 1971 में पाकिस्तान के आक्रमण के फलस्वरूप जारी किया गया यह मार्च 1977 तक रहा।

3.    जून 1975:- में तीसरा आपातकाल और मार्च 1977 में समाप्त।

 

राष्ट्रपति शासन

>    अनुच्छेद 355:- यह अनुच्छेद केन्द्र को इस कर्तव्य के लिये बाधित करती है कि प्रत्येक राज्य सरकार संविधान के अनुरूप चले।

   अनुच्छेद 356:- अनुच्छेद 355 के विपरित स्थिति होने पर/संवैधानिक तंत्र विफल होने पर राज्य सरकार को अपने नियंत्रण में ले लेगी इसे राष्ट्रपति शासन कहते है। इसे राज्य आपात पर संवैधानिक आपात भी कहते है। इस संबंध में प्रतिवेदन राज्यपाल द्वारा भेजा जायेगा। अनुच्छेद 35 मैं दो आधारों पर राष्ट्रपति शासन घोषित होगा।  1. 356               2. 365
(i)    अनुच्छेद 356:- राष्ट्रपति से यह घोषणा करने का अधिकार देना है कि अगर आश्वस्त हो जाये की राज्यों का प्रशासन संविधान के अनुरूप नही हैं तो राष्ट्रपति राज्यों के राज्यपाल के वितरण के आधार पर/ बिना विवरण के भी इन्हें लागू कर सकता है।
(ii)   अनुच्छेद 365:- यदि कोई राज्य केन्द्र के निर्देशों का पालन करने में असफल हो जाता है तो राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है।

>    संसद का अनुमोदन व समयावधि:-

1.    राष्ट्रपति शासन, घोषणा होने के दो माह में भीतर संसद के दोनों सदनों द्वारा स्वीकृत हो जाना चाहिये। राष्ट्रपति शासन की घोषणा के साथ ही लोकसभा का विघटन हो जाये तो ऐसी स्थिति में उसे राज्य सभा द्वारा स्वीकृति मिलना आवश्यक हो लोकसभा के पुनर्गठन के बाद पहली बैठक से 30 दिन तक घोषणा बनी रहेगी।

2.    यदि संसद के दोनों सदनों की स्वीकृति मिलने के बाद राष्ट्रपति शासन छःमाह तक चलता है तो उसे अधिकतम 3 वर्ष के लिये छः-छः माह तक बढाया जा सकता है।
42 वें संविधान संशोधन द्वारा 1976 में 6 माह की अवधि को बढ़ाकर 1 वर्ष कर दिया गया, लेकिन 1978 में वापस 6 माह कर दिया।

>    अपवाद:- पंजाब में पाँच वर्ष तक जारी रखा गया (1987-1992)।

>    1991 में 68 वें संविधान संशोधन द्वारा समय बढ़ाया गया।

>    राष्ट्रपति शासन की घोषणा को मंजूरी देने वाला प्रत्येक प्रस्ताव किसी भी सदन द्वारा, सामान्य बहुमत से पारित होना चाहिये अर्थात् सदस्यों की उपस्थिति और मतदान में भाग लेने वालों की संख्या।

>    राष्ट्रपति शसन को बढ़ाना:- यह दो परिस्थितियों में बढ़ाया जा सकता हैं।
1.    संपूर्ण भारत में राष्ट्रपति आपात लागू हो
2.    जब निर्वाचन आयोग यह प्रमाणित करे की संबधित राज्य में चुनाव करवाना संभव नहीं है।

>    राष्ट्रपति शासन के प्रभाव:-
1.    राज्य सरकार के सभी कार्य केन्द्र के हाथ में
2.    राज्य की विधायी शक्तियाँ केन्द्र के पास
3.    विधानसभा व केबिनेट निलंबित
4.    राज्य का प्रशासन राज्यपाल/राज्यसचिव/राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त सलाहकार द्वारा चलाया जायेगा।
5.    राज्य की संचित निधि पर लोकसभा का अधिकार

वितीय आपात ( अनुच्छेद 360)
>    यदि राष्ट्रपति संतुष्ट हो जाये की देश में आर्थिक स्थिति ढीक नहीं है देश की साख को खतरा है तो देश के किसी भी क्षेत्र में/ संपूर्ण भारत में वित्तीय आपात लागू हो जायेगा।

>    राष्ट्रपति के इस निर्णय हो किसी भी न्यायालय में चुनौति नही की जा सकती यह व्यवस्था 1978 से पहले थी परन्तु 1978 में 44 वे संविधान संशोधन द्वारा यह प्रावधान किया गया कि ऐसी घोषणा न्यायिक समीक्षा से पुरे नही हो।

>    संसद का अनुमोदन व समयावधि:- आपातकाल की घोषणा के 2 माह के भीतर संसद की अनुमति मिलना आवश्यक है, यदि आपात घोषणा के दौरान लोकसभा भंग हो जाये तो ऐसी स्थिति में राज्य सभा अनुमोदन करेगी। लोकसभा के पुर्नगठन के बाद पहली बैठक से 30 दिन के भीतर अनुमति देनी।

>    नोट:- संसद के दोनों सदनों की एक बार अनुमति मिलने के पश्चात् यह आपात अनिश्चित काल तक प्रभावी रहेगा। जब तक की इसे वापस ना लिया जाये इस प्रकार इसकी अधिकतम सीमा निधारित नही है और ना ही इसे संसद की बार-बार मंजूरी की आवयकत है। संसद मंजूरी के बिना भी राष्ट्रपति इसे वापस ले सकता है।

>    वितीय आपात के प्रभाव:-
1.    केन्द्र कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
2.    राज्य की सारी वितीय शक्तियाँ केन्द्र के पास चली जायेगी।
3.    राज्य सेवा के सभी सेवकों के वेतन व भतो में कटौती
4.    राज्य द्वारा परित घन विधेयक या अन्य वितीय विधेयक को राष्ट्रपति के लिये आरक्षित रखा जा सकता है।
5.    राष्ट्रपति केन्द्र सेवा के सभी कर्मचारियों और न्यायाधीशों के वेतन और भतों में कटौती का निर्देश दे सकता है इस प्रकार वितीय आपात की अवधि में राज्य के सभी वितीय मामलों पर केन्द्र का नियंत्रण हो जायेगा।
6.    एच.एच. कुजरू के अनुसार वितीय आपात राज्य की वितीय सुंप्रभुता के लिये खतरा है।

अनुसूचियाँ
>    अनुसूची 1:- संघ और उसके क्षेत्र
>    अनुसूची 2:- वेतन व भत्ते राष्ट्रपति, राज्यपाल, मुख्यपदाधिकारीयो
>    अनुसूची 3:- राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मंत्री, न्यायाधीशों (शपथ)
>    अनुसूची 4:- राज्य सभा की सीटों में विभिन्न राज्य की सीटों का बंटवारा
>    अनुसूची 5:- अनुसूचित जाति, जनचाति क्षेत्रों का प्रशासन व नियंत्रण संबधी उपबंध
>    अनुसूची 6:- असम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा के जनजाति क्षेत्रों हेतु उपबंध
>    अनुसूची 7:- तीन सूचियाँ (राज्यसूची, समवर्ती सूची, संघ सूची)
>    अनुसूची 8:- भाषा (22 भाषाये)
>    अनुसूची 9:- विशेष  प्रावधान (भूमि संबधी विशेष प्रावधान)
>    अनुसूची 10:- दलबदल
>    अनुसूची 11:- पंचायती राज
>    अनुसूची 12:- नगर निगम (नगर पालिका)

जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति

>    अनुसूची 1 के अनुसार जम्मू-कश्मीर भारतीय संघ का एक संवैधानिक राज्य है।

>    भाग -21 अनुच्छेद 370 में जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया है। इसके अनुसार भारतीयसंविधान के प्रावधान इस पर लागू नही होगें। इसका अपना अलग राज्य संविधान है।

>    इसके अलावा भाग-21 में भारतीय संघ में 10 राज्य विशेष दर्जा होने का लाभ उठा रहे है। लेकिन उन्हें यह लाभ कुछ मामलों मे ही प्राप्त है।

>    जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय:-
जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने स्वतंत्र रहने का निर्णय लिया था, 20 अक्टुबर 1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया, 26 अक्टुबर 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर किये तथा रक्षा, बाहरी मामले व संचार पर भारत का नियंत्रण हो गया।

>    भारत सरकार ने आश्वासन दिया कि इस राज्य के लोग अपनी स्वयं की विधानसभा के द्वारा, इस राज्य को आंतरिक संविधान तथा राज्य पर भारत संघ के अधिकार क्षेत्र को निर्धारित करेगें। इसी के परिणामस्वरूप भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 में जम्मू-कश्मीर के लिये अंतरिम व्यवस्था की गई।

>    यह प्रावधान अस्थायी था। यह प्रावधान 17 नवम्बर 1952 से संचालित होने लगा था।
1.    अनुसूची 1 का प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागू रहेगा।
2.    अनुच्छेद 370 को राज्य की विधानमण्डल की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा समाप्त/परिवर्तित किया जा सकता है।

>   संसद की सीमाये:- जम्मू कश्मीर के लिये संसद की कानून निर्माण की शक्ति निम्न बातों तक सीमित है।

1.    वे मामले जो संघ सूची व समवर्ती में है जिनका राज्य सूची में उल्लेख है वे मामले राज्य सरकार की सलाह से राष्ट्रपति द्वारा घोषित किये गये है।

2.    संघ और समवर्ती सूची या अन्य मामले जिम्हें राष्ट्रपति द्वारा जम्मू कश्मीर की सरकार की सहमति से उल्लेखित किया गया है उन पर कानून बनाने का अधिकार राज्य को होगा ऐसे कानून जम्मू कश्मीर की सहमति से ही बन सकते है।

>    जम्मू- कष्मीर संविधान की विशेषतायें:-
सितम्बर-अक्टुबर 1951 में इस राज्य की संविधान सभा का निर्वाचन हुआ और इस कार्य के लिये  इन्हें 5 वर्ष का समय दिया गया। इसका संविधान 17 नवम्बर 1957 को अंगीकृत किया गया जबकि इसे 26 जनवरी 1957 को प्रभाव में लाया गया। इसकी विशेषताये निम्न हैं:-

1.    जम्मू-कश्मीर भारत का एक अखण्ड भाग है यह राज्य के लोगों को न्याय, स्वत्रंता, समानता, बंधुत्व में सुरक्षित रखता है।

2.    जम्मू-कश्मीर राज्य में वह क्षेत्र शामिल है जो 15 अगस्त 1947 के शासक के अंतर्गत था, अर्थात् पाक अधिकृत क्षेत्र भी इसमें शामिल है।

3.    नीति-निदेशक सिद्धांतो की एक सूची इसमें शामिल है और उसका उल्लेख राज्य शासन में है फिर भी न्यायिक रूप  से प्रभावी है। (भारतीय संविधान मंे वर्णित नीति-निदेशक सिद्धांत जम्मू-कश्मीर पर प्रभावी नहीं है।)

4.    जम्मू-कश्मीर में द्विसदनीय विधानसभा का प्रावधान है विधानसभा में 100 सदस्य होगे और वे जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचित है।
-    100 में से 24 स्थान रिक्त है पाक अधिकृत क्षेत्र के प्रतिनिधियों के लिये।
-    विधानपरिषद् में 36 सदस्य निर्वाचित होते है।

5.    संविधान द्वारा राज्य की सभी शक्तियाँ राज्यपाल को दी गई है। राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा 5 वर्ष के लिये की जाती है।

6.    राज्यपाल की सहायता के लिये मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एक मंत्रिपरिषद् होगी, जब संविधान लागू हुआ जब जम्मू-कश्मीर के लिये राज्य का मुख्य सदर ए रियासत या राष्ट्रपति (जिसे 1965 में राज्यपाल नाम दिया) सरकार के मुखिया को 1957 में वजीर-ए-आजम कहा गया जिसे 1965 में मुख्यमंत्री कहा गया।

7.    जम्मू-कश्मीर के लिये एक उच्च-न्यायालय होगा जिसमें एक मुख्य-न्यायाधीश व दो या दो से अधिक अन्य न्यायाधीश होगे। इनकी नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश और राज्यपाल की सलाह से राष्ट्रपति करेगा।

8.    जम्मू-कश्मीर के लिये अधिकारिक भाषा ‘‘ उर्दू ‘‘ घोषित की गई, इसके साथ में ‘‘ अग्रेंजी ‘‘ का अनुमोदन किया गया।

9.    जम्मू-कश्मीर के संविधान के लिये 2/3 बहुमत से विधेयक पारित करना आवश्यक है, इस तरह का विधेयक केवल विधानमण्डल में पारित होना चाहिये परन्तु ऐसा कोई विधेयक नहीं होगा जो भारत संघ व जम्मु कश्मीर के संबधो में परिवर्तन लाता हो ।

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